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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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महाराज ! पूर्वकाल में मैं तुम्हारी ही तरह वाराणसी का राजा था।
शराब के बिना न रह सकता था। बिना मांस का भोजन न खा सकता था।
नगर में उपोसथ के दिनों में पशु-हत्या बन्द रहती। रसोइये ने पक्ष की त्रयो-
दशी को ही मांस लेकर रख दिया। संभाल कर रखा न होने से उसे कुत्ते
खा गए। रसोइये ने उपोसथ के दिन मांस न पा, राजा के लिए नाना प्रकार
के स्वादिष्ट भोजन बना प्रासाद पर चढ राजा के पास भोजन न ले जा सकने
के कारण देवी के पास जाकर पूछा-देवी ! आज मुझे मांस नहीं मिला।
बिना मांस का भोजन राजा के पास नहीं ले जा सकता। क्या करूँ ?
"तात ! मेरा पुत्र राजा को अत्यन्त प्रिय है। पुत्र को देख कर राजा
उसे चूमता हुआ, लाड-प्यार करता हुआ अपना क्षुन्निद्र भी भूल जाता है।
मैं पुत्र को सजाकर राजा की गोदी में बिठा दूंगी। उसके पुत्र के साथ खेलते
समय तू भोजन लाना।"
ऐसा कह उसने अपने पुत्र सुन्दर बालक को सजाकर राजा की गोद में
बैठाया। राजा के पुत्र के साथ खेलने समय रसोइया भोजन लाया। शराब
के नशे में बेहोश राजा ने पका हुआ मांस न पा पूछा-मांस कहाँ है ? 'देव !
आज दिन पशु-हत्या बन्द रहने से मांस नहीं मिला।' राजा ने 'मुझे मांस नहीं
मिलेगा' कह गोद में बैठे प्रिय पुत्र की गर्दन मरोड, जान से मार रसोइये के
सामने फेंका और आज्ञा दी-जल्दी से पका कर ला। रसोइये ने वैसा किया।
राजा ने पुत्र-मांस के साथ भोजन किया। राजा के भय से न कोई रो पीट
सका न कुछ कह ही सका।
राजा ने भोजन खा, शय्या पर सो, प्रातःकाल उठ नशे के उतरने पर
कहा-मेरे पुत्र को लाओ। उस समय देवी रोती हुई चरणों पर गिर पडी।
राजा ने पूछा-'भद्रे ! क्या हुआ ?' बोली-'देव ! कल आपने पुत्र को
मारकर पुत्र-मांस के साथ भोजन खाया।' राजा ने पुत्रशोक से अभिभूत
हो रो पीट कर 'मुझे यह दुख सुरापान के कारण हुआ' समझ सुरापान में
दोष देख बालू से मुँह पोछते हुए प्रतिज्ञा की- "अद्य से मैं अर्हत्व प्राप्त होने तक
ऐसी विनाशकारिणी सुरा को कभी नहीं पीऊँगा।" तब से मद्य नहीं पी,
इसीलिए मत्तो अह महाराज, यह गाथा कही।
तब राजा ने पूछा- मित्र ! क्या देखकर तू स्नेह-हीन हो गया ? उस