जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextकुण्डकपूव ] १७
इस प्रकार बोधिसत्व ने सीखनेयोग्य शिल्पो (के सीखने) का माहात्म्य
कहा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के
पति-पत्नी ही अब के पति-पत्नी। पण्डित अमात्य तो मैं ही था।
१०६. कुण्डकपूव जातक
“ययन्नो पुरिसो होति” यह शास्ता ने श्रावस्ती में रहते समय, एक
महा दरिद्र (मनुष्य) के सम्बन्ध से कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती म कभी एक ही परिवार बुद्ध तथा उनके सघ को दान देता,
कभी तीन चार परिवार एक मे मिलकर, कभी एक गण, कभी एक गली के
लोग, कभी सारे नगर के लोग मिलकर। उस समय एक गली के लोग
मिलकर दान दे रहे थे। मनुष्य बुद्ध तथा सघ को यवागु परोसकर कहने लगे
“खाजा लाभो।”
उस गली में रहनेवाले, दूसरो की मजदूरी करके जीनेवाल, एक दरिद्र
मनुष्य ने सोचा—"में यवागू नही दे सकता। खाजा दूँगा।" (यह सोच)
उसने चावल की बहुत बारीक कनखी ले, छाज से फटक कर पानी से भिगो,
आक के पत्तो में रख, भाग मे पकाया। फिर 'यह बुद्ध को दूंगा' सोच उसे ले
जाकर शास्ता के सामने खडा हुआ। (लोगो ने) 'खाजा लाभो' पहली बार
कहा ही था कि उसने सबसे पहले जाकर शास्ता के सामने वह पूडा रख दिया।
शास्ता ने औरो के दिये हुए खाजो को अस्वीकार कर उसी पूडे-खाजे को ग्रहण
किया। उसी समय सारे नगर में एक शोर मच गया कि सम्यक् सम्बुद्ध ने उस
महादरिद्र का खाना बिना घृणा के खाया।
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