जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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बोधिसत्त्व ने दूसरे से पूछा—
“क्या यह सच है ?”
"स्वामी ! मैं उसे लेकर गया। चिड़िया के उसे ले जाने की बात सच
ही है।”
“क्या इस दुनिया में चिड़ियाँ बच्चो को ले जाती हैं ?”
“स्वामी ! मैं भी आपसे पूछना चाहता हूँ कि चिड़ियाँ तो बच्चों को
लेकर आकाश में नहीं उड़ सकती, तो क्या चूहे लोहे के फाल खा सकते हैं ?”
“इसका क्या मतलब है ?”
“स्वामी ! मैंने इसके घर में पाँच सौ फाल रक्खे। यह कहता है कि तेरे
फालो को चूहे खा गए और ‘यह तेरे फालो को खाने वाले चूहों की मेंगनी है’
वह मेंगनी दिखाता है। स्वामी ! यदि चूहे फालें खाते हैं, तो चिड़ियाँ भी
बच्चे ले जाती हैं। यदि नहीं खाते हैं, तो बाज तब भी नहीं ले जा सकते हैं।
यह कहता है कि तेरे फाला को चूहं खा गए। उन्होंने खाए, या नहीं खाए—
इसकी परीक्षा करें। मेरे मुकदमे का फैसला करें।”
बोधिसत्त्व ने सोचा—इसने शठ के प्रति शठता का व्यवहार करके जीतने
की बात सोची होगी। उसने कहा—तूने ठीक सोचा है। और यह गाथा
कही—
सठस्स साठेय्यमिदं सुचिन्तित,
पच्चोड्डितं पतिकूटस्स कूट ।
फालञ्चे खादेय्यु मूसिका,
कस्मा कुमारं कुलला नो हरेय्यु ॥
कूटस्स हि सन्ति कूटकूटा,
भवति चापि निकतिनो निकत्या ।
देहि पुत्तकट्ठ फालनट्ठस्स फाल,
मा ते पुत्तमहासि फालनट्ठो ॥
[ शठ के प्रति शठता, यह अच्छा सोचा है। कुटिल के प्रति कुटिलता
का जाल फैलाया है। यदि चूहे फाल खा जाएँगे, तो चिड़ियाँ बच्चे को क्यों
नहीं ले जाएँगी।