जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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सेवन से सन्तुष्ट (होते) हैं। अकोविदो गामधम्मस्स सेग्गु, सेग्गु, उसका नाम
है। सो धम्म सेग्गु । तू इस ग्राम्य धर्म में, इस चाण्डाल-कर्म में दक्ष नही है।
कोमारि को नाम सवज्ज धम्मो, धम्म कुमारी । यह आज तेरा क्या स्वभाव
है ? य त्व गहिता पवने परोदसि, जो तू मेरे द्वारा इस वन में कामभोग के लिए
पकड़ी जाने पर रोती है। स्वीकार नहीं करती। यह तेरा क्या स्वभाव है ?
क्या तू कुमारी ही है ? —पूछता है।
इसे सुन कुमारी ने कहा—हाँ तात ! मैं कुमारी ही हूँ। मैं मैथुन धर्म को
नहीं जानती हूँ। ऐसा कह, रोती हुई दूसरी गाथा बोली—
यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताणं,
सो मे पिता दूभि वने करोति ॥
सर कस्स कन्दामि वनस्स मज्झे,
यो तायिता सो सहसा करोति ॥
अर्थ उपरोक्त प्रकार¹ से ही है।
तब वह तरकारी बेचने वाला उस लड़की की परीक्षा कर, घर ले जा,
तरुण को दे यथा-कर्म सिधारा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों का प्रकाशन कर जातक का मेल बैठाया।
सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर तरकारी बेचने वाला श्रोतापत्ति फल में
प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय लड़की (अब की) लड़की ही थी। पिता पिता ही हुआ।
उस बात को प्रत्यक्ष करने वाला वृक्ष देवता मैं ही था।
¹पण्णिक जातक (१०२)