जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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सो मं दहति, जो यह रागाग्नि है यह मुझे जलाती है। चित्तं धूपतपेति मं,
रागयुक्त मेरा चित्त ही मुझे तपाता है, कष्ट देता है, पीडा देता है। जासिनो
कैवर्त्तो (मछुओ) को सम्बोधन करता हूँ। यह जाल के अर्थी होने से जासिनो
कहलाते हैं। मुञ्चययिरा मं, स्वामी मुझे छोड़ दें, यही याचना करता हूँ
न कामे हञ्ञते क्वचि, काम मे प्रतिष्ठित, काम में बहता हुआ प्राणी कहीं नहीं
मारा जाता; तुम्हारे जैसो को उसे मारना योग्य नहीं। अथवा कामे हेतु के
अर्थ में सप्तमी का प्रयोग है। काम-हेतु से मछली के पीछे पीछे चलने वाला
वही भी तुम्हारे जैसो से नहीं मारा जाता।
उसी समय बोधिसत्त्व ने नदी किनारे जा उस मच्छ का रोना सुन, मछुओ
के पास पहुँच उस मच्छ को छुड़ाया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर उत्कण्ठित भिक्षु स्रोतापत्ति फल
में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय मछली पूर्व-भार्या थी। उत्कण्ठित भिक्षु मच्छ था। पुरोहित
मैं ही था।
२१७. सेग्गु जातक
“सब्बो लोको....” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय एक
तरकारी बेचन वाले उपासक के बारे मे कही।