जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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३४२ [ २.७.२१२ ]
ऊपर ठंडा और नीचे गरम होना चाहिए। यह वैसा नहीं है। इसलिए तुझे
पूछता हूँ। किस कारण से ऊपर का भात गरम और नीचे का ठंडा है?
ब्राह्मणी अपनी करतूत के प्रकट हो जाने के भय से ब्राह्मण के बार बार
कहने पर भी चुप ही रही। उस समय बोधिसत्त्व को यह सूझा कि कोठे में
बिठाया हुआ आदमी जार होगा और यह घर का स्वामी। ब्राह्मणी अपनी
करतूत के प्रकट होने के भय से कुछ नहीं बोलती। हन्त ! मैं इसकी करतूत
प्रकट कर जार के कोठे में बिठाए होने की बात कह दूँ।
उसने ब्राह्मण के घर से निकलने से जार के घर में प्रवेश करने, अनाचार
करने, श्रेष्ठ भात खाने, ब्राह्मणी का दरवाजे पर खड़े हो रास्ता देखने और
जार को कोठे में उतारने तक का सब हाल कह दूसरी गाथा कही—
अहं नटोस्मि भदन्ते भिक्खकोस्मि इधागतो,
अयं हि फोट्ठमोतिण्णो अयं सो यं गवेससि ॥
[स्वामी ! मैं नट हूँ। भीख मांगने के लिए यहाँ आया हूँ। यह है कोठे
सें उतरा हुआ और यह ही है जिसे तू खोजता है।]
अहं नटोस्मि भदन्ते, स्वामी ! मैं नट जाति का हूँ। भिक्खकोस्मि
इधागतो मैं भिखमंगा यहाँ भीख माँगता हुआ आया हूँ। अयं हि कोट्ठमोतिण्णो
यह इसका जार इस भात को खाता हुआ तेरे भय से कोठे में उतरा है। अयं
सो यं गवेससि, जिसे तू खोज रहा है कि यह किसका जूठा भात होगा, वह यही
है। 'इसे बालो से पकड़, कोठे से निकाल ऐसा कर जिसमें इसे होश रहे और
फिर यह ऐसा पाप-कर्म न करे' कह चला गया।
ब्राह्मण उन दोनों को डरा, पीट कर ऐसी शिक्षा दे जिसमें वे फिर ऐसा
पाप-कर्म न करें, कर्मानुसार गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित भिक्षु सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय ब्राह्मणी पूर्व-भार्या थी। ब्राह्मण उत्कण्ठित। नट-पुत्र मैं
ही था।