जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
Page 350 of 479
Read in contextसंसुमार ] ३३१
यहां इन अस्वादिष्ट फलो को खाते हुए तू अभ्यस्त स्थान में ही चरता है ?
गङ्गा-पार आम, कटहल के मधुर फलो की सीमा नही । क्या तुम्हें गङ्गा-पार
जाकर फल-मूल नही खाने चाहिएँ ?
"मगरराज ! गङ्गा में पानी बहुत है। वह विस्तृत है। मैं उधर कैसे
जाऊँ ?"
"यदि चले तो मैं तुझे अपनी पीठ पर चढ़ा कर ले जाऊँगा।"
उसने उसका विश्वास कर 'अच्छा' कह स्वीकार किया। 'तो आ मेरी
पीठ पर चढ' कहने पर चढ गया। मगरमच्छ थोडी दूर जा उसे डुबाने लगा।
बोधिसत्त्व ने पूछा—दोस्त ! यह क्या ? मुझे पानी में डुबा रहा है।?
"मैं तुझे धर्म-भाव से नही ले जा रहा हूँ। मेरी भार्या के मन में तेरे
कलेजे के लिए दोहद उत्पन्न हुआ है। मैं उसे तेरा कलेजा खिलाना चाहता हूँ।"
"दोस्त ! तूने कह दिया सो अच्छा किया। यदि हमारे पेट में कलेजा
हो तो एक शाखा से दूसरी शाखा पर घूमते हुए चूर्ण विचूर्ण हो जाए।"
"तो तुम कहाँ रखते हो ?" "
बोधिसत्त्व ने पास ही पके फलो से लदा हुआ एक गूलर का पेड दिखाकर
कहा—देख, हमारे कलेजे इस गूलर के पेड पर लटकते है।
"यदि मुझे कलेजा दे, तो मैं तुझे नही मारूँगा।"
"तो आ मुझे वहाँ ले चल। मैं तुझे वृक्ष पर लटका हुआ दूँगा।"
वह उसे लेकर वहाँ गया। बोधिसत्त्व ने उसकी पीठ पर से छलांग मार
गूलर की शाखा पर बैठ कहा—सौम्य ! मूर्ख मगरमच्छ ! तूने यह मान लिया
कि इन प्राणियो का कलेजा वृक्ष की शाखाओ पर होता है। तू मूर्ख है। मैने
तुझे ठगा है। तेरे फल-मूल तेरे ही पास रहें। तेरा शरीर ही बड़ा है। अक्ल
नही है।
यह कह, इसी बात को प्रकट करते हुए यह गाथाएँ कही— :-
अलमेतेहि अम्बेहि जम्बूहि पनसेहि च,
यानि पार समुद्दस्स वर मय्ह उदुम्बरो ॥
महती वत ते बोन्दि न च पञ्ञाण तदुप्पिका,
सुसुमार वञ्चितो मेसि गच्छ दानि यथासुखं ॥