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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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३२२ [ २.६.२०५
[ गङ्गेय्य मछली शोभा देती है, यामुनेय्य भी शोभा देती है; लेकिन यह
चार पैरों वाला, बट-वृक्ष की तरह गोलाकार, गाड़ी की बल्ली की तरह लम्बी
गर्दन वाला (पुरुष) सब से अधिक सुन्दर है।]
चतुप्पदायं, यह चतुष्पाद पुरिसो अपने बारे में कहता है। निग्रोध परि-
मण्डलो, अच्छी तरह उलझा न्यग्रोध वृक्ष की तरह गोलाकार। ईसाकामतगीवो
रथ की धड़ की तरह लम्बी वल्ली वाला। सम्बेव अतिरोचति इस प्रकार
के आकार वाला कछुवा सबसे बढ़कर सुन्दर है, तुम दोनों से बढ़कर शोभा
देता है।
मछलियों ने उसकी बात सुन 'अरे पापी कछुए ! हमारी पूछी बात का
उत्तर न दे, दूसरी ही कहता है' यह दूसरी गाथा कही—
यं पुच्छितो न तं अक्खा अञ्ञं अक्खासि पुच्छितो,
अत्तप्पसंसको पोसो नायं अस्माक रुच्चति ॥
[ जो पूछा है वह नहीं कहता; पूछने पर दूसरी बात कहता है। यह
अपनी ही प्रशंसा करने वाला पुरुष हमें अच्छा नहीं लगता।]
अत्तप्पसंसको, अपनी प्रशंसा करने वाला, अपनी बड़ाई करने वाला पुरुष।
नायं अस्माक रुच्चति, यह पापी कछुवा हमें अच्छा नहीं लगता, रुचिकर नहीं
है। वे कछुए के ऊपर पानी फेंक अपने निवासस्थान को गईं।