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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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३२० [ २.६.२०५
यह सुन वीरक ने 'हाँ, मै जानता हूँ कि तेरा स्वामी कहाँ गया है' कह दूसरी
गाथा कही—
उदकथलचरस्स पक्खिनो निच्चं आमकमच्छभोजिनो,
तस्सानुकरं सविट्ठको सेवाले पळिगुण्ठितो मतो ॥
[ सविट्ठक जल और स्थल पर चलने वाले, नित्य कच्ची मछली खाने वाले,
पक्षी की नकल करने जाकर काई में फँस कर मर गया । ]
उदकथलचरस्स, जो जल और स्थल में चलने में समर्थ है। पक्खिनो,
अपने सम्बंध में कहता है। तस्सानुकरं उसकी नकल करता हुआ। पळि-
गुण्ठितो मतो, पानी में घुस काई को छेद कर बाहर न निकल सकने के कारण
काई में उलझ कर पानी के अन्दर ही मर गया। देख, उसकी चोच दिखाई
देती है।
इसे सुन कौवी रो पीट कर वाराणसी ही चली गई।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। तब सविट्ठक
देवदत्त था। वीरक मैं ही था।
२०५. गङ्गेय्य जातक
"सोभति मच्छो गङ्गेय्यो..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय दो तरुण भिक्षुओं के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वे दो श्रावस्ती वासी कुलपुत्र बुद्ध-शासन में प्रव्रजित हो अशुभ-भावना में
न लग रूप के प्रशंसक हो, रूप को ही प्यार करते हुए घूमते थे। एक दिन उन