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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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३१२ [ २.६.२०३

[ हंस, क्रोञ्च, मोर, हाथी तथा चितकबरा मृग सभी सिंह से डरते हैं।
शरीर से बड़ा-छोटा नही होता। इसी प्रकार मनुष्यो में चाहे आयु का छोटा
हो लेकिन यदि यह बुद्धिमान् हैं तो वह ही बडा है। बडे शरीर वाला मूर्ख
बडा नही होता।]


पसदामिगा, पसद नामक मृग, पसद मृग तथा शेष मृग भी अर्थ है। पसद-
मिगा भी पाठ है। पसद मृग अर्थ है। नत्थि कायस्मि तुल्यता, शरीर से बडा
छोटा नही है, यदि हो तो बडे शरीर वाले पसद मृग और हाथी सिंह को मार
डालें। सिंह हंसादि क्षुद्र शरीर वालो को ही मारे। छोटे ही सिंह से डरें, बडे
नही, ऐसा नही है। इसलिए सभी सिंह से डरते है। सरीरवा मूर्ख वडे शरीर
वाला होने पर भी बडा नही होता। इसलिए लकुण्टक भद्दिय यद्यपि शरीर
से छोटा है, इससे यह न समझो कि वह ज्ञान में भी छोटा हैं।


शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यो के अन्त में उन भिक्षुओ में से कोई स्रोतापन्न, कोई सकृदागामी,
कोई अनागामी तथा कोई अर्हत हो गए।

उस समय राजा लकुण्टक भद्दिय था। उसके क्रीडा-प्रिय होने से दूसरे
क्रीडा-प्रिय हो गए। शक्र मै ही था।

* २०३. खन्धवत्त जातक

“विरूपक्खेहि मे मेत्तं .” इसे शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
एक भिक्षु के बारे में कहा।