जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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होकर कामगुणं पहाय यजन्ति, धन देते हैं। धन देकर, हिमवन्त में प्रविष्ट हो
ऋषियों के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो ध्यान-सुख में रत रही हूँ।
इस प्रकार बोधिसत्त्व यह उल्लास-वाक्य कह ध्यान-युक्त हो ब्रह्मलोक-
गामी हुए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों का प्रकाशन किया। सत्यों के अन्त
में कोई सोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी तथा कोई अर्हत् हुए।
उस समय माता महामाया थी। पिता शुद्धोदन महाराजा। भार्या
राहुलमाता। पुत्र राहुल। पुत्र-दारा को छोड़ निरत कर प्रव्रजित होने वाला
पुरुष मैं ही था।
२०२. केळिसील जातक
"हंसा कोञ्चा मञ्जुरा च . ." यह शास्ता ने जेतवन में विहरते समय
आयुष्मान् लकुण्टक भद्दिय के सम्बन्ध में कही।
क. वर्तमान कथा
वह आयुष्मान् बुद्ध-शासन में प्रसिद्ध थे, सर्व-विदित थे, मधुर स्वर वाले
थे, मधुर धर्मोपदेशक थे, पटिसम्भिदा-ज्ञान प्राप्त थे, महा क्षीणास्रव थे, लेकिन
साथ ही वे अस्सी स्थविरों में कद के ठिंगने, श्रामणेर की तरह बौने, खेलने
के लिए बनाए खिलौने की तरह छोटे।
एक दिन जब वह तथागत को प्रणाम कर जेतवन के कोठे में गए थे,
देहात के तीस भिक्षु बुद्ध को प्रणाम करने की इच्छा से जेतवन आए। उन्होंने
विहार के दरवाजे पर स्थविर को देख 'कोई श्रामणेर हैं' समझ स्थविर को