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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

Page 320 of 479

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Page 320

साधुसील ] ३०५
अत्यो अत्यि सरीरम्हि वढव्यस्स नमोकरे,
अत्यो अत्यि सुजातम्हि सीलं अस्माकरुच्चति ॥
[ शरीर की भी अपनी विशेषता है, ज्येष्ठ को नमस्कार होता है। सुजात
की भी विशेषता है; लेकिन हमें तो शीलवान् अच्छा लगता है।]
अत्यो अत्यि सरीरम्हि, रूपवान् शरीर में भी अर्थ, विशेषता, उन्नति
होती है। नही होती है, नही कहते। वढव्यस्स नमो करे, ज्येष्ठ को हम
नमस्कार ही करते हैं। ज्येष्ठ की ही वन्दना होती है। अत्यो अत्यि सुजातम्हि,
सुजात पुरुष की भी उन्नति होती है। जाति-सम्पत्ति भी इच्छा करने ही की
चीज़ है। सीलं अस्माकरुच्चति, हमें शील ही अच्छा लगता है। शीलवान्,
सदाचारी शरीर-सौन्दर्य से रहित भी पूज्य प्रशंसनीय होता है।
ब्राह्मण ने उसकी बात सुन सदाचारी को ही लडकियाँ दीं।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों के अन्त में ब्राह्मण स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय ब्राह्मण यही था; प्रसिद्ध आचार्य्य तो मैं ही था।