जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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क. वर्तमान कथा
शास्ता ने पूछा-"भिक्षु, क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?"
"भन्ते ! सचमुच।"
"किस कारण से ?"
"एक अलङ्कृत स्त्री को देखकर कामुकता के कारण।"
"भिक्षु, स्त्री की जाति की संभाल नही की जा सकती। पूर्व समय में
द्वारपाल रखकर हिफाजत करने वाले भी हिफाजत नहीं कर सके। तुझे
स्त्री से क्या ? मिलने पर भी उसकी हिफ़ाज़त नही की जा सकती।" इतना
कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही-
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसो में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
तोते की योनि में पैदा हुए। उसका नाम था राध। उसके छोटे भाई का
नाम था पोट्ठपाद। उन दोनो को ही, जब वह छोटे ही थे एक चिड़ीमार ने
पकड़ कर वाराणसी के एक ब्राह्मण को दिया। ब्राह्मण ने उन्हें पुत्र की तरह
पाला। उसकी ब्राह्मणी दुश्चारिणी थी, उसकी हिफाजत नही 'की जा
सकती थी।
ब्राह्मण ने व्यापार करने के लिए जाते समय उन तोते-बच्चो को बुलाकर
कहा-"तात ! में व्यापार के लिए जाता हूँ। समय असमय तुम अपनी माता
की करनी पर नजर रखना। दूसरे आदमी का अन्दर आना जाना देखना।"
इस प्रकार वह उन तोते-बच्चों को ब्राह्मणी सौंप कर गया।
वह उसके बाहर जाने के समय से ही अनाचार करने लगी। रात को
भी, दिन को भी आने जाने वालो की सीमा न रही। उसे देख पोट्ठपाद ने राध
से कहा- "ब्राह्मण इस ब्राह्मणी को हम सौंप कर गया। यह पाप-कर्म
करती है। मैं इसे मना करूँ?" राध न कहा- "मत बोल।" वह उसका
कहना न मान बोला- "अम्ब ! तू पापकर्म किस लिए करती है ?"
उसने उसे मार डालने की इच्छा से कहा- "तात ! तू मेरा पुत्र है।
अब से न करूंगी। जरा, यहाँ आ।" इस प्रकार प्यार करती हुई की तरह