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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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उपाध्याय ने क्रोध से उठकर पीटा—'तेरा मेरा विश्वास क्या है ?"
उसकी वह करनी भिक्षुओ में प्रकट हो गई। एक दिन भिक्षुओ ने धर्म-
सभा में बातचीत चलाई—"आयुष्मानो ! अमुक तरुण-भिक्षु ने उपाध्याय
का विश्वास कर वस्त्र-खण्ड ले उससे जूता रखने की थैली बनाई। उपाध्याय
ने 'तेरा मेरा क्या विश्वास हैं' कह क्रोध से उठकर पीटा।
शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
"अमुक बातचीत।"
"भिक्षुओ, यह भिक्षु न केवल अभी अपने शिष्य का अविश्वासी है, पहले
भी अविश्वासी ही था।"
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी देश मे ब्राह्मण-कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम
से प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर गण के नेता हो वह
हिमालय-प्रदेश मे रहने लगे।
उन ऋषियो के समूह में एक तपस्वी था, जो बोधिसत्त्व का कहना न
मान एक हाथी के बच्चे को जिसकी माँ मर गई थी, पालता था। बडे होने
पर वह उस तपस्वी को मार जगल में चला गया। उसका शरीर-कृत्य कर
ऋषियो ने बोधिसत्त्व को घेर कर पूछा—"भन्ते ! मित्र या अमित्र कैसे
पहचाना जा सकता है ?"
बोधिसत्त्व ने 'इस इस बात से' कहते हुए यह गाथा कही—
न नं उम्हयते दिस्वा न च नं पटिनन्दति
चक्खूनि चस्स न ददाति पटिलोमञ्च वत्तति ॥१॥
एते भवन्ति आकारा अमित्तस्मि पतिट्ठिता
येहि अमित्तं जानेय्य दिस्वा सुत्वा च पण्डितो ॥२॥