जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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"तो मेरी पीठ पर चढो।"
कुछ चढे। कुछ ने पूँछ पकड़ी। कुछ हाथ जोडे खडे ही रहे। बोधिसत्व
अपने प्रताप से सभी ढाई सौ व्यापारियो को, जो हाथ जोडे खडे थे उन तक को
जनपद ले गए। वहाँ उन्हे उन उनके स्थान पर पहुँचा स्वय अपने निवास-
स्थान को गए। वह यक्षिणियाँ भी औरो के आने पर उन ढाई सौ व्यापारियो
को जो पीछे रह गए थे मार कर खा गईं।
शास्ता ने भिक्षुओ को सम्बोधन कर कहा—"भिक्षुओ, जैसे उन यक्षि-
णियो के वशीभूत हुए व्यापारी विनाश को प्राप्त हुए। बादल अश्व-राज
का कहना मानने वाले अपने अपने स्थान पर पहुँच गए। इसी प्रकार बुद्धों
के उपदेश के अनुसार न चलने वाले भिक्षु, भिक्षुणियों तथा उपासक और
उपासिकाएँ भी चारों नरको तथा पाँच प्रकार के बन्धन, दण्ड आदि से महान्
दुःख को प्राप्त होते हैं। उपदेश मानने वाले तीन कुल-सम्पत्तियों,¹ छ काम-
स्वर्ग तथा बीस ब्रह्मलोको को प्राप्त हो, अमृत महानिर्वाण को साक्षात कर
महान् सुख का अनुभव करते हैं।" अभिसम्बुद्ध होने पर यह गाथाएँ कही—
ये न काहन्ति ओवाद नरा बुद्धेन देसित,
व्यसन ते गमिस्सन्ति रक्खसीहिव वाणिजा ॥१॥
ये च काहन्ति ओवाद नरा बुद्धेन देसित,
सोत्थि पारङ्गमिस्सन्ति वालाहेनेव वाणिजा ॥२॥
[ जो बुद्ध के उपदेश के अनुसार आचरण नही करते थे उसी तरह दुःख
को प्राप्त होते हैं जैसे राक्षसियो द्वारा व्यापारी। जो बुद्ध के उपदेश के अनुसार
चलते हैं वे उसी तरह सकुशल पार पहुँच जाते हैं जैसे बादल (के अश्व) की
सहायता से व्यापारी।]
ये न काहन्ति जो नहीं करेगे। व्यसन ते गमिस्सन्ति, वे महान् दुःख को
प्राप्त होगे। रक्खसीहीव वाणिजा राक्षसिंयो द्वारा लुभाए गए व्यापारियो
की तरह। सोत्थि पारङ्गमिस्सन्ति बिना किसी विघ्न के निर्वाण को प्राप्त
¹ ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य।