जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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प्रणाम करने लगे—ओह ! पतिदेवता !
राजा ने फिर उससे पूछा—"तुझे कुलवालो ने इसे सौंपा है ? यह तेरा
स्वामी है ?"
उसने राजा को न पहचानते हुए धीर बन कर कहा—"देव ! हाँ।"
तब राजा ने उसे पूछा—"क्या यह वाराणसी राजा का पुत्र है ? क्या
तू पदुमकुमार की भार्या अमुक राजा की अमुक नाम की लडकी नही है ?
मेरी जाँघ का लहू पीकर इस लुञ्जे के प्रति आसक्त हो मुझे प्रपात से गिरा
दिया। यह तू अब अपने सिर पर मृत्यु ले मुझे मरा समझ यहाँ आई है ? मैं
जीता हूँ।" इतना कह, अमात्यो को बुला राजा ने कहा—"अमात्यो ! क्या मैने
तुम लोगो के पूछने पर यह नहीं कहा था कि मेरे छ छोटे भाइयो ने छ स्त्रियो
को मार कर मास खाया। लेकिन मैने अपनी स्त्री को सकुशल गङ्गा किनारे
लाकर एक आश्रम में रहते हुए, एक दण्ड-प्राप्त लुञ्जे को (पानी से) निकाल
सेवा की। उस स्त्री ने उस आदमी के प्रति आसक्त हो मुझे पर्वत पर से गिरा
दिया। मै अपने मैत्रीचित्त के कारण नही मरा। जिसने मुझे पर्वत से गिराया
था, वह कोई और नहीं थी, यही दुराचारिणी थी। जो दण्ड-प्राप्त लुञ्जा था,
वह भी कोई दूसरा न था, यही था।"
यह कह यह गाथाएँ कही—
अयमेव सा अहमपि सो अनञ्ञो,
अयमेव सो हत्थच्छिन्नो अनञ्ञो;
यमाहु कोमारपती ममन्ति,
वज्झित्थियो नत्थि इत्थीसु सच्चं ॥
इमञ्च जम्म मुसलेन हन्त्वा,
लूदं छव परदारूपसेविं;
इमिस्सा च न पापपतिव्वताय,
जीवन्तिया छिन्दथ कण्णनासं ॥
[ यही वह है। मैं भी वही हूँ। यह हाथ कटा भी वही है। दूसरा नही
है जिसे 'यह मेरा कोमारपति' कहती है। स्त्रियाँ वध्य करने योग्य हैं। उनमें
सत्य नहीं होता ।