जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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एक दिन राजा ने राजागण में खड़े होकर उन्हें बड़े ठाट बाट से राजा
की सेवा में आते देख, सोचा—यह मुझे मारकर राज्य भी ले सकते हैं। इस
शङ्का से सदाद्विग्न हो उसने उन्हें बुलाकर कहा—तात ! तुम इस नगर में
नहीं रह सकते। दूसरी जगह जाओ। मेरे मरने पर आकर कुल-प्राप्त राज्य
ग्रहण करना।
ये पिता का कहना मान रोते पीटते घर गए। अपनी अपनी स्त्रियो को ले,
जहाँ कही जाकर जीवन बिताने के लिए नगर से निकले। रास्ते चलते हुए
वे एक कान्तार में पहुँचे। वहाँ खाना पीना न मिला। भूख न सह सकने के
कारण उन्होने सोचा, जीते रहेंगे तो स्त्रियां मिलेंगी। सबसे छोटे भाई की
स्त्री को मारकर उसके तेरह टुकड़े कर उसका मास खाया।
बोधिसत्त्व ने अपने और भार्या के लिए मिले दो हिस्सो में से एक रख
छोड़ा, एक को दोनो ने खाया। इस प्रकार छ दिनो में छ स्त्रियो का मास
खाया गया। बोधिसत्त्व ने एक एक करके छ दिनो में छ टुकड़े रख छोड़े।
सातवें दिन 'बोधिसत्त्व की भार्या को मारेंगे' कहने पर बोधिसत्त्व ने वे छ
टुकड़े उन्हें देकर कहा कि आज यह खाओ। कल देखेंगे।
जिस समय वह मास खाकर सो रहे थे, बोधिसत्त्व अपनी भार्या को लेकर
भाग निकले। उसने थोडी दूर चलकर कहा स्वामी ! चल नही सकती हूँ।
बोधिसत्त्व उसे कन्धे पर लेकर सूर्योदय के समय कान्तार से निकले। सूर्यो-
दय होने पर उसने कहा—स्वामी ! प्यास लगी है। बोधिसत्त्व ने कहा—
भद्रे ! पानी नही है। लेकिन बार बार माँगने पर बोधिसत्त्व ने अपनी दाहिनी
जाँघ में तलवार का प्रहार कर कहा—भद्रे ! पानी नही है। यह मेरी दाहिनी
जाँघ का लहू पी ले। उसने वैसा किया।
वे क्रम से महानदी पर आए। पानी पी, नहा कर फलमूल खाते हुए,
आराम करने की एक जगह पर विश्राम किया। फिर गङ्गा के मोड की जगह
पर आश्रम बनाकर रहने लगे।
गङ्गा के ऊपर के हिस्से में किसी राज्यापराधी चोर को हाथ पाँव तथा
नाक काट कर बोरे में बिठा गङ्गा में बहा दिया गया था। वह बहुत चिल्लाता
हुआ उस जगह आ लगा। बोधिसत्त्व ने उसकी करुणापूर्ण रोने पीटने की
आवाज सुन 'मेरे रहते कोई दुख प्राप्त प्राणी नष्ट न हो' सोच गङ्गा किनारे