जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextचिन्ता करने से राग, द्वेष और मोह के वशीभूत हो वह अस्थिर चित्त हो गया।
मन्त्रों को क्रम से न पढ़ा सकता था। जहाँ तहाँ मन्त्र समझ में न आते थे।
एक दिन वह बहुत सी सुगन्धियों तथा माला आदि लेकर जेतवन गया।
वहाँ शास्ता की पूजा कर एक ओर बैठा। शास्ता ने कुशलक्षेम पूछने के बाद
कहा—माणवक ¹ क्या मन्त्र पढ़ाते हो? मन्त्रों का अभ्यास बना है?"
"भन्ते ! पहले मुझे मन्त्र अभ्यस्त थे। लेकिन जब से घर बसाया, तब
से मेरा चित्त अस्थिर हो गया। इससे मन्त्रों का अभ्यास नहीं रहा।"
शास्ता ने उसे कहा—"माणवक ! न केवल अभी, पहले भी जब तेरा
चित्त स्थिर था, तभी तुझे मन्त्रों का अभ्यास था। रागादि से अस्थिर होने
के समय तुझे मन्त्र समझ में नहीं आए।"
उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते हुए बोधिसत्व ब्राह्मणों
के एक प्रधान कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला में मन्त्र सीख प्रसिद्ध
आचार्य्य हो वाराणसी में बहुत से क्षत्रिय, ब्राह्मण कुमारों को वेद पढ़ाने लगा।
उसके पास एक ब्राह्मण माणवक ने तीनों वेदों का अभ्यास किया। प्रत्येक
पद तब में असंदिग्ध हो, उपाचार्य्य बन मन्त्र सिखाने लगा। वह आगे चलकर
गृहस्थ हो गृहस्थी की चिन्ता से अस्थिर चित्त होने के कारण मन्त्रों का पाठ
नहीं कर सकता था। आचार्य्य के पास जाने पर आचार्य्य ने पूछा—"माणवक !
क्यो तुझे मन्त्र अभ्यस्त हैं?"
"गृहस्थ होने के समय से मेरा चित्त अस्थिर हो गया। में मन्त्रों का पाठ
नहीं कर सकता।"
ऐसा कहने पर आचार्य्य ने 'तात! अस्थिर चित्त होने से अन्यन्त
मन्त्रों का भी प्रतिभान नहीं होता, स्थिर चित्त रहने पर विस्मृति होती ही
नहीं' कह यह गाथाएँ कहा—
यसोदके अस्सिमे अण्णवम्हि
न पस्सति सिप्पिसम्बुकञ्च