जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context६ [ १.११.१०४
१०४. मित्तविन्द जातक
“चतुब्भि अट्ठज्झगमा” आदि शास्ता ने जेतवन में रहते समय, एक
दुर्भाषी भिक्षु के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
पहले आई मित्तविन्द जातक की कहानी के सदृश ही यह कहानी भी
जाननी चाहिये।
ख. अतीत कथा
लेकिन यह जातक कथा है काश्यप-सम्बुद्ध के समय की। उस समय एक
नरक-निवासी ने, जिसके सिर पर घूमनेवाला चक्र¹ था और जो नरक में जल
रहा था, बोधिसत्त्व से पूछा—“भन्ते ! मैने क्या पापकर्म किया है ?” बोधि-
सत्त्व ने “तूने अमुक और अमुक पापकर्म किया है” कह यह गाथा कही—
चतुब्भि अट्ठज्झगमा अट्ठाहिपि च सोळस
सोळसाहि च बत्तिस अतिच्छं चक्कमासदो;
इच्छाहुतस्स पोसस्स चक्कं भमति मत्थके ॥
[ चार से आठ, आठ से सोलह, और सोलह से बत्तीस की इच्छा करने
के कारण यह सिर पर घूमनेवाला चक्र प्राप्त हुआ। क्योंकि इच्छा (लोभ)
से ताड़ित मनुष्य के सिर पर चक्र भ्रमता है।]
¹ उरचक्र—पालि-कोष में (रीजडेविड्स ने) उर-चक्र का अर्थ छाती
पर रक्खा लोहे का चक्र किया है, जो यथार्थ नहीं। 'उर' शब्द वैदिक है, जिसका
अर्थ है गतिमान्।