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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

Page 268 of 479

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Page 268

सङ्गामावचर ] २५३
निष्णात हो वाराणसी राजा के एक शत्रु-राजा की सेवा म रहने लगा। उसने
उसके मङ्गल हाथी को अच्छी तरह सिखाया। राजा ने वाराणसी राज्य
को जीतने की इच्छा से बोधिसत्त्व को साथ ले मङ्गल हाथी पर चढ बडी
भारी सेना के साथ चढाई की। उसने वाराणसी-नरेश के पास सन्देश भेजा—
युद्ध करें या राज्य दे।
ब्रह्मदत्त ने युद्ध करने का निर्णय किया। उसने चारदीवारी के दरवाजो
पर, अट्टालिकाओ पर, नगर-द्वारो पर सेना को बिठा युद्ध करना शुरु किया।
शत्रु-राजा ने मङ्गल हाथी को कवच बाँध, स्वय भी कवच पहन, हाथी
के कन्धे पर बैठ तेज अङ्कुस ले हाथी को नगर की ओर बढाया, ताकि नगर
(की चारदीवारी) को तोड शत्रु को मार राज्य को हस्तगत कर सके। हाथी
ने जब देखा कि उधर से गर्म-गारा आदि फेंका जा रहा है तथा गुलेल और
नाना प्रकार के दूसरे प्रहार किए जा रहे हैं तो वह मरने से भयभीत हो पास
न जा सकने के कारण लौट पडा।
हाथी-शिक्षक ने उसके पास जाकर कहा—"तात ! तू शूर है। सग्राम-
जित है। इस तरह के मौके पर पीछे लौटना तेरे लिए अयोग्य है।" इतना
कह हाथी को उपदेश देते हुए यह दो गाथाएँ कही—
सङ्गामावचरो सूरो बलवा इति विस्सुतो
किन्नु तोरणमासज्ज पटिक्कमसि कुञ्जर !
ओमह् खिप्पं पळिघ एसिकानि च अब्बह
तोरणानि पमद्दित्वा खिप्पं पविस कुञ्जर !
[ कुञ्जर ! यह प्रसिद्ध है कि तू सङ्ग्राम-जित है, शूर है, बलवान् है।
तोरण के पास पहुँच कर तू क्यो पीछे लौटता है ? बाधा को जल्दी तोड
डाल। स्तम्भो को उखाड फेंक। कुञ्जर ! दरवाजो का मर्दन करके तू
जल्दी नगर में प्रविष्ट हो।]
इति विस्सुतो तात ! तू ऐसे सङ्ग्राम को जिसमें प्रहार मिलते हो मर्दन
करके विचरने वाला होने से सङ्गामावचरो, दृढ-हृदय वाला होने से सूरो।
बल-सम्पन्न होने से बलवा, यह प्रसिद्ध है, ज्ञात है, प्रकट है। तोरणमासज्ज,