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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

Page 260 of 479

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Page 260

असदिस ] २४५
वशोड हो वाराणसी लौटे। राजा न मरते समय कहा, असदिसकुमार को
राजा तथा ब्रह्मदत्त कुमार को उपराजा बनाना। इतना कह वह मर गया।
उसके मर जाने पर जब बोधिसत्त्व को राज्य दिया जाने लगा, उसने मना
कर दिया कि मुझे राज्य की ज़रूरत नहीं है। ब्रह्मदत्त का राज्याभिषेक कर दिया
गया। बोधिसत्त्व ने कहा कि मुझे यश नहीं चाहिए; और किसी भी चीज
की इच्छा नहीं की। छोटे भाई के राज्य करते हुए वह जैसे साधारण ढंग से
रहते थे, उसी तरह रहते रहे।
राजा के नौकर चाकरों ने राजा को यह कह कर कि बोधिसत्त्व राज्य
चाहते हैं, राजा का मन बोधिसत्त्व की ओर से फेर दिया। उसने उनका
विश्वास कर, चित्त में सन्देह पैदा हो जाने के कारण मनुष्यों को आज्ञा दी
कि मेरे भाई को पकड़ो।
बोधिसत्त्व के किसी हितचिन्तक ने उन्हें इसकी सूचना दी। छोटे भाई
से क्रुद्ध हो बोधिसत्त्व किसी दूसरे राष्ट्र में चले गए। वहाँ राजद्वार पर पहुँचे
कहलाया कि एक धनुर्धारी आया है। राजा ने पूछा कि क्या वेतन लेगा ?
उत्तर दिया—एक वर्ष के लिए एक लाख। राजा ने आज्ञा दी—अच्छा, आ
जाए। उसके समीप आकर खड़े होने पर पूछा—
“तू धनुर्धारी है ?”
“देव ! हाँ।”
“अच्छा ! मेरी सेवा में रह।”
तब से वह राजा की सेवा में रहने लगे। उन्हें जो वेतन मिलता था, उसे
देख पुराने धनुर्धारी क्रुद्ध हुए कि इसे बहुत मिलता है।
एक दिन राजा उद्यान गया। वहाँ मङ्गल-शिला की शय्या के पास कनात
तनवा आम के वृक्ष के नीचे महाशय्या पर लेटा। ऊपर देखते हुए उसने एक
आम देखा। उसे लगा कि इस आम को चढ़ कर नहीं तोड़ा जा सकता।
इसलिए उसने धनुर्धारियों को बुलवा कर पूछा—"क्या इस आम को तीर
मार कर गिरा सकते हो ?”
‘देव ! यह हमारे लिए कठिन कार्य नहीं है। लेकिन ! देव ! हमारा
कौशल तो आपने पहले अनेक बार देखा है। जो नया धनुर्धर आया है, वह
हमारी अपेक्षा बहुत पाता है। उससे गिरवाएँ।”