जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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उसे खूब भूख लगी थी। वह बोधिसत्त्व की ओर देखने लगा—"यदि यह
भात देगा, तो खा लूंगा।" लेकिन बोधिसत्त्व बिना कुछ बोले खाते रहे।
माणवक ने सोचा—यह चाण्डाल बिना मुझे पूछे ही सब खाए जा रहा
है। इससे जबरदस्ती छीन कर भी, ऊपर का जूठा भात हटा कर शेष खाना
चाहिए। उसने वैसा कर जूठा भात खाया।
भात खाते के ही साथ माणवक के मन में बड़े जोर का पश्चाताप पैदा
हुआ। वह सोचने लगा—"मैंने अपनी जाति, गोत्र तथा प्रदेश के योग्य कार्य
नहीं किया। मैंने चाण्डाल का जूठा भात खा लिया।" उसी समय उसके
मुंह से रक्त सहित भात बाहर आया।
इस बड़े जोर से शोकातुर हो कि मैंने जरा सी बात के लिए अनुचित
कर्म किया, उसने रोते हुए यह पहली गाथा कही—
सञ्च अप्पञ्च उच्छिट्ठ सञ्च किच्छेन नो अदा,
सोहं ब्राह्मणजातिको यं भुत्तं तम्पि उग्गतं ॥
[वह थोड़ा सा था। जूठा था, और वह भी उसने कठिनाई से दिया।
ब्राह्मण जाति का होकर मैंने वह खाया। जो खाया सो भी निकल गया।]
जो मैंने खाया वह अप्पं उच्छिट्ठं तं च नो उस चाण्डाल ने अपनी इच्छा
से नहीं बल्कि ज़बरदस्ती करने पर किच्छेन कठिनाई से दिया। सोहं परिशुद्ध
ब्राह्मण जाति का होकर (खाया) उसीसे मैंने यं भुत्तं तम्पि रक्त के साथ उग्गतं।
इस प्रकार माणवक रो पीट कर 'मैंने ऐसा अनुचित काम किया, अब
मैं जी कर क्या करूँगा' सोच जंगल में चला गया। वहाँ सबसे छिपे रह कर
अनाथ-मरण मरा।
शास्ता ने यह पूर्व की बात कह उपदेश दिया—'भिक्षुओ, जैसे सतधम्म
माणवक को उस चाण्डाल का जूठा भात खाने से, अपने लिए अनुचित भात
खाया रहने से, न हँसी आई न मन प्रसन्न हो सका, इसी प्रकार जो इस शासन
में प्रव्रजित हो अनुचित ढंग से जीविका चलाता है और उसमे प्राप्त पदार्थों का