जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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अभी प्रज्ञावान् नहीं हैं, पहले भी प्रज्ञावान् तथा उपायकुशल रहे हैं।" इतना
कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक
वानर के रूप में पैदा हो अस्सी हजार बन्दरों की मण्डली के साथ हिमालय
में रहने लगे।
वहीं पास ही एक प्रत्यन्त-गाँव था, जो कभी बसता था, कभी उजड़ जाता
था। उस गाँव के बीच में शाखा-प्रशस्त तथा मधुर फलों से युक्त एक तिन्दुक-
वृक्ष था। जब गाँव बसा न होता, तो वानर आकर उस वृक्ष के फल खाते।
अगली बार फलों का मौसम आने पर वह गाँव बसा हुआ था। उसके
चारों ओर बाँसो का घेरा था और एक फाटक था। उस वृक्ष की शाखाएँ
भी फलों के भार से झुकी हुई थीं।
वानर सोचने लगे—हम पहले अमुक गाँव में तिन्दुक फल खाते थे।
इस बार वह वृक्ष फला है या नहीं ? उस गाँव में बस्ती है या नहीं ? यह
सोच उन्होंने एक वानर को समाचार मालूम करने के लिए भेजा।
उसने लौट कर कहा कि वृक्ष फला है और गाँव में घनी बस्ती है।
वानरों ने जब सुना कि वृक्ष फला है तो उन्हें बड़ी खुशी हुई कि मीठे मीठे फल
खाने को मिलेंगे। बहुत सारे वानरों ने वानरेश को जाकर कहा। वानरेश
ने पूछा—"गाँव बसा है वा नहीं ?
'देव ! बसा है।"
“तो (लौट) जाओ। मनुष्य बहुत मायावी होते हैं।"
"देव ! आधी रात के समय जब मनुष्य सो जाएँगे, तब खाएँगे।"
बहुत से वानरों ने जाकर वानरेश को मना लिया। फिर हिमालय से
उतर, उस ग्राम से थोड़ी ही दूर पर वह मनुष्यों के सोने के समय की प्रतीक्षा
करते हुए एक बड़े भारी पत्थर पर सो रहे। आधी रात को जब मनुष्य सो
रहे थे उन्होंने वृक्ष पर चढ़ फल खाए।
एक आदमी शौच के लिए घर से निकला। उसने गाँव के बीच