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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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कळायमुट्ठि ] २२७
[ तुम इसके स्वभाव को नही जानते । बिना जाने ही प्रशंसा कर रहे हो ।
इसने अग्नि-शाला खराब कर दी और दो कमण्डल तोड़ डाले । ]
अनञ्जाय बिना जाने । ऊहन्त इस दुष्ट बन्दर द्वारा मैली की गई।
कमण्डलु कुण्डी, द्वे च कुण्डियां उसके द्वारा भिन्ना । इस प्रकार उसने दुर्गुण
कहे ।
मनुष्यो ने बन्दर का ढोग जान, ढेले और लाठियाँ ले, पीट कर भगा
दिया। तब ऋषिगण को भिक्षा दी। ऋषि भी हिमालय प्रदेश में ही जा
ध्यानावस्थित हो ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय बन्दर यह ढोंगी था। ऋषि-गण बुद्ध-परिषद थी। गण-
शास्ता तो मैं ही था।
१७६. कळायमुट्ठि जातक
"बालो यतायं दुमसारगोचरो . . ." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय
कोशल नरेश के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक बार वर्षा ऋतु के समय कोशल नरेश के इलाके में बग़ावत हुई।
वहाँ जो योद्धा थे, उन्होने दो तीन युद्ध किए। जब वह शत्रुओ को न जीत
सके तो उन्होने राजा के पास सन्देश भेजा।
राजा वर्षा-ऋतु में असमय में ही निकल पड़ा। जेतवन के समीप पड़ाव
डलवाकर उसने सोचा—मैं असमय में निकल पड़ा हूँ। कन्दराएँ और