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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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२२२ [ २.३.१७३
[ तात ] यह एक माणवक ताड-वृक्ष को आश्रय करके बैठा है। यह घर
है। हन्त ! हम इसे गृह दे । ]
माणवको एसो, प्राणी वाची शब्द है। तात ! यह एक माणवक प्राणी है।
'एक तपस्वी है' यही प्रकट करता है। तालमूलं अपस्सितो, ताड के वृक्ष के
आश्रय है। अगारकञ्चिद अत्थि, यह हमारा प्रव्रजितो का घर है। पर्ण-
कुटी को लेकर कहा है। हन्द, निश्चय के अर्थ में निपात है। वेमस्सगारकं,
इसे एक कोने में रहने के लिए घर दें।
बोधिसत्त्व ने पुत्र की बात सुन उठकर पर्ण-कुटी के दरवाजे पर खडे हो
देखकर पहचान लिया कि वह बन्दर है। उन्होने कहा—'तात ! मनुष्यों का
मुंह ऐसा नहीं होता। यह बन्दर है। इसे यहाँ नहीं बुलाना चाहिए।' यह
कहते हुए दूसरी गाथा कही—
मा खो तं तात ! पक्कोसि दूसेय्य नो अगारकं
नेतादिस मुखं होति ब्राह्मणस्स सुसीलिनो ॥
[ तात ! इसे मत बुला । यह हमारे घर को खराब कर देगा। सदाचारी
ब्राह्मण का ऐसा मुंह नही होता । ]
दूसेय्य नो अगारकं, यह यहाँ प्रवेश पाकर इस कठिनाई से बनाई हुई
पर्ण-कुटी को या तो आग से जलाकर अथवा मल त्याग कर खराब कर दे
सकता है। नेतादिसं शीलवान् ब्राह्मण का ऐसा मुंह नहीं होता।
'यह बन्दर है' कह बोधिसत्त्व ने एक जलती हुई लकडी फेंकी कि यहाँ
क्यो बैठा है ? इस प्रकार उसे भगा दिया। बन्दर वल्कल वस्त्र छोड वृक्ष
पर चढ वन में चला गया। बोधिसत्त्व चारो ब्रह्म विहारो की भावना कर
ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बन्दर
यह ढोंगी भिक्षु था। तपस्वी-कुमार राहुल। तपस्वी तो मैं ही था।