जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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हे राजन ! आज मुझे वह कीर्ति उत्पन्न हुई है, शुभ-नाम मिला
है। उसे देखकर मैं प्रव्रजित होऊँगा । मुझे काम-भोगो की इच्छा नही
रही है।]
कल्याण धम्मो, सुन्दर धर्म, समञ्ञ अनुपापुणाति जब शीलवान, सदाचारी,
वा प्रव्रजित इस प्रकार की कीर्ति तथा लोक-व्यवहार आरम्भ हो जाता है।
तस्मा न हीयेय, उस श्रमणत्व (की ख्याति) से न हटे । हिरियापि सन्तो धुर-
मादियन्ति, महाराज ! सत्पुरुष अपने अन्दर से उत्पन्न लज्जा से, बाह्य-निन्दा
से पैदा हुए भय से भी इस प्रव्रज्या को ग्रहण करते हैं।
इध मज्ज, यहाँ मेरे द्वारा आज ताह समेक्ख मैं उस श्रमणत्व को गुण-
रूप से देखता हुआ नत्थि मय्हि छन्दो, मुझ में इच्छा नही है, इध कामभोगे, इस
दुनिया में वस्तु-कामना वा कामेच्छा ।
बोधिसत्त्व ने यह कह राजा से प्रव्रज्या की आज्ञा ली। फिर हिमालय-
प्रदेश में जा ऋषि-प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ
प्राप्त कर ब्रह्म-लोक गामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय राजा आनन्द था। वाराणसी सेठ तो मैं ही था।
१७२. दद्दर जातक
को नु सद्देन महता, यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कोकालिक
भिक्षु के बारे में कही।