जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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मुदिता-भावना तथा उपेक्षा-भावना का अभ्यास करना चाहिए। मैत्री-पूर्ण
चित्त अर्पणा-समाधि तथा ब्रह्मलोक-परायणता तक को प्राप्त कराता है।"
इस प्रकार मैत्री-भावना की प्रशंसा करते हुए उन्होने यह गाथा कही—
यो वे मेत्तेन चित्तेन सब्ब लोकानुकम्पति
उद्धं अधो च तिरियं च अप्पमाणेन सब्बसो
अप्पमाणं हितं चित्तं परिपुण्णं सुभावितं
यं पमाण कतं कम्मं न तं तत्रावसिस्सति
[ जो अप्रमाण मैत्री चित्त से ऊपर-नीचे तथा तिर्यक् दिशा में सारे लोको
पर अनुकम्पा करता है, उसके प्रमाण रहित, परिपूर्ण अच्छी तरह से भावना
किए गए मैत्री-चित्त के (फल) के आगे जो सीमित कर्म है उसका फल नहीं
ठहरता।]
यो वे मेत्तेन चित्तेन सब्ब लोकानुकम्पति, क्षत्रिय आदि में अथवा श्रमण-
ब्राह्मण आदि में जो कोई अर्पणा-प्राप्त चित्त से सारे प्राणियो पर अनुकम्पा
करता है, उद्धं पृथिवी से नेवसञ्ञानासञ्ञायतन ब्रह्मलोक तक अधो पृथ्वी
से नीचे उस्सद नाम के महानरक तक, तिरियं, मनुष्य लोक में जितने चक्रवाल
हैं उन सब में जितने प्राणी है वह सभी वैर-रहित हो, क्रोध-रहित हो, दुःख-
रहित हो; इस प्रकार भावना किए गए मैत्री-चित्त से। अप्पमाणेन अप्रमाण
प्राणियो के कारण असीम आलम्बन होने से अप्रमाण। सब्बसो सब तरह
से ऊपर, नीचे तथा तिर्यक् इस प्रकार सब सुगति तथा दुर्गति में। अप्पमाणं
हितं चित्तं सभी प्राणियों के प्रति मैत्री की असीम भावना। परिपुण्णं सम्पूर्ण
सुभावितं अच्छी प्रकार उन्नत, इसका मतलब है अर्पणा-चित्त। यं पमाण कतं
कम्मं जो यह अप्पमाण-अप्पमाणारम्मण, परित्तं-अप्पमाणारम्मण तथा अप्प
माणं-परित्तारम्मणं तीन प्रकार के आरम्मण पर पूर्ण अधिकार करते हुए उसे
न बढा कर जो सीमित कामावचर कर्म किया जाता है। न तं तत्रावसिस्सति
वह सीमित (परित्त) कर्म जो अप्रमाण मैत्री-चित्त रूपी रूपावचर धर्म है,
उसके सामने नहीं ठहरता। जैसे बाढ़ के आने पर सीमित पानी उससे पृथक
नहीं रह सकता है, नहीं ठहरता है; वह बाढ़ में ही मिल जाता है। उसी प्रकार