जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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री जगह नहीं है जहाँ श्मशान न बना हो, जहाँ कोई न मरा हो। यम्हि
च्चं च धम्मो च, जिस व्यक्ति में चार आर्य-सत्य, पूर्व-भाग-सत्य ज्ञान¹ तथा
कुत्तर धर्म हैं, अहिंसा, दूसरो को कष्ट न देना, संयमो, सदाचार, दमो
न्द्रियो का दमन। जिस आदमी में यह गुण है, एतदरिया सेवन्ति बुद्ध, प्रत्येक
र तथा बुद्ध श्रावक आर्य-जन इस स्थान का सेवन करते हैं। इस प्रकार
आदमी के पास जाते हैं, उसकी संगति करते हैं। एत लोके अनामृतं, यही
र लोक में अमृतत्व का साधन होने से अमृत कहलाते है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व पिता तथा पुत्र को धर्मोपदेश दे चारो ब्रह्मविहारो
भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने इस धर्मोपदेश को ला (आर्य-)सत्यों को प्रकाशित कर जातक
मेल बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर दोनो पिता पुत्र
तापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुए।
उस समय के पिता पुत्र ही अब के पिता पुत्र हुए। तपस्वी तो मैं ही था।
१६७. समिद्धि जातक
"अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु..." यह शास्ता ने राजगृह के तपोदाराम मे
ार करते हुए समिद्धि स्थविर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक दिन आयुष्मान् समिद्धि सारी रात योगाभ्यास करके अरुणोदय के
य स्नान कर अपने स्वर्ण-वर्ण शरीर को सुखा रहे थे। उन्होने अन्तरवासक
¹ मार्ग प्राप्ति से पहले का आर्य-सत्यों का ज्ञान।