जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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यदपिदं विसमसीलेन सोणेन सुहनुस्सह, यह जो सुहनु दुष्ट घोडा सोण
के साथ प्रेम करता है, यह अपने विरुद्ध स्वभाव वाले के साथ नहीं। यह अपने
समान शील वाल के ही साथ करता है। यह दोनो दुष्ट स्वभाव वाले होने से
समान स्वभाव वाले या समान धातु वाले हैं। सुहनू'पि तादिसोयेव यो
सोणस्स सगोचरो, जैसा सोण सुहनु भी वैसा ही। यो सोणस्स सगोचरो, जो
सोण की चरने की जगह है, वही उसकी भी। जैसे सोण अश्व-गोचर है अश्वो
को काटता हुआ ही चरता है, उसी तरह सुहनु भी। इस प्रकार उनकी समान
गोचरता प्रदर्शित की गई है। उनके आचरण की एकता दिखाने के लिए
पक्खन्दिना आदि कहा गया है।
पक्खन्दिना, अश्वो के ऊपर कूद पडने के स्वभाव वाला। पगलब्भेन, काय-
प्रगल्भता आदि दुश्शीलता से युक्त। निच्च संदानखादिना, हमेशा अपनी लगाम
खा जाने की आदत वाले से। समेति पाप पापेन, इन दोनो में से एक का पाप,
दुष्टता दूसरे के बराबर है। असन्ता अस इन दोनो मे से एक दुष्ट दुराचारी
के साथ दूसरे का अस बुरा काम बराबरी करता है। जैसे गूंह आदि के साथ
गूंह आदि मिल जाता है, कोई अन्तर नही रहता, वैसा ही।
इतना कहकर बोधिसत्त्व ने राजा को उपदेश दिया—'महाराज !
राजा को अधिक लोभी नही होना चाहिए। दूसरो का धन नष्ट करना उचित
नही।' फिर घोडो की कीमत लगवा उचित मूल्य दिलवाया।
घोडो के व्यापारी यथोचित मूल्य पाकर सतुष्ट लौटे। राजा भी बोधि-
सत्त्व के उपदेशानुसार रह कर्मानुसार परलोक सिधारा।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय दो घोड यह दो दुष्ट भिक्षु थे। राजा आनन्द था। पण्डित
थामात्य तो में ही था।