जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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सिंहनी ने तथा सियारनी ने भी दो दो पुत्रो को जन्म दिया। वे सब इकट्ठे
रहने लगे।
एक दिन सिंहनी के मन में आया—यह सिंह सियार को, सियारनी को,
तथा उसके बच्चो को बहुत प्यार करता है। इसका सियारनी से सम्बन्ध अवश्य
होगा। इसी लिए उससे स्नेह करता है। मैं इसे कष्ट देकर, डराकर भगाऊँ।
जिस समय सिंह सियार को साथ ले शिकार के लिए जाता सिंहनी सियारनी
को डराती, धमकाती—तू यहाँ क्यो रहती है? यहाँ से भागती क्यो नही?
उसके बच्चे भी सियारनी के बच्चो को वैसे ही तग करते, धमकाते।
सियारनी ने सियार से सब हाल कहा और बोली—"पता नही, सिंहनी
सिंह के ही कहने से ऐसा व्यवहार करती है। हम यहाँ बहुत दिन रह चुके।
वह हमारी जान भी ले सकता है। अपने निवास स्थान पर ही चले।"
सियार ने उसकी बात सुन सिंह के पास आकर कहा—
"स्वामी ! हम तुम्हारे पास बहुत समय रहे। अधिक देर तक
समीप रहने वाले अप्रिय हो जाते हैं। हमारे शिकार के लिए चले जाने पर
सिंहनी सियारनी को तग करती है। उसे डराती है कि यहाँ क्यो रहती है?
यहाँ से भाग। सिंह-बच्चे भी सियार-बच्चो को डराते धमकाते है। यदि किसी
को किसी का अपने पास रहना अच्छा न लगे तो 'जाओ' कह कर उसे निकाल
देना चाहिए, तग करने की क्या जरूरत है।"
इतना कह यह पहली गाथा कही—
येन काम पणामेति धम्मो बलवत मिगो!
उन्नदन्ति विजानाहि जात सरणतो भयं ॥
[ हे सिंह ! बलवान् का यही स्वभाव है कि जहाँ चाहता है भगा देता है।
हे उन्नत दाँत वाले (सिंह) ! यह जान ले कि शरण-स्थल से ही भय पैदा हो
गया।]
येन कामं पणामेति धम्मो बलवतं बलवान अथवा ऐश्वर्यशाली अपने सेवक
को जिस दिशा में चाहता है उस दिशा में भगा देता है, निकाल देता है, यह
बलवानो का धर्म है। यह ऐश्वर्य-शालियो का स्वभाव है। यही परम्परा है।