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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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अलीनचित्त ] १६१
को काम करने के लिए देकर स्वयं जाना चाहिए । वह बिना बढ़इयों को सूचित
किए ही जंगल में गया । वहाँ से लड़के को ले आकर बढ़इयों से बोला—"यह
मेरा लड़का है। तुमने मुझे जीवन दान दिया है। मैं डाक्टर की फीस के बदले
में इसे देता हूँ। अब से यह तुम्हारी सेवा किया करेगा।" इतना कह, पुत्र
को आदेश दे कि पुत्र ! जो कुछ मेरा काम है, वह सब अब से तू करना, उसे
बढ़इयों को सौंप स्वयं जंगल में प्रवेश किया ।
उस समय से यह हाथी बच्चा बढ़इयों के कहने के अनुसार सब काम करने
लगा । ये भी उसे पाँच सौ पिण्ड देकर पोसते। वह काम समाप्त कर नदी में
उतर खेलकर आया करता। बढ़इयों के बच्चे भी उसे सूण्ड आदि से पकड़
जल और स्थल में सभी जगह उसके खेलते। श्रेष्ठ हाथी हो, घोड़े हों, अथवा
मनुष्य हो, कोई भी पानी में मल-मूत्र नहीं त्यागते। वह भी पानी में मल-मूत्र
न कर बाहर नदी के किनारे पर ही करता था।
एक दिन नदी के ऊपर के हिस्से में वर्षा हुई। हाथी की आधी सूखी लेण्डी
पानी से बहकर नदी के रास्ते जा वाराणसी नगर के पत्तन पर एक झाड़ी
में जा अटकी ।
राजा के हाथी-सेवक पाँच सौ हाथियों को नहलाने के लिए ले गए। श्रेष्ठ
हाथी की लेण्डी की गन्ध सूँघकर एक भी हाथी ने पानी में उतरने की हिम्मत न
की। सभी पूँछ उठाकर भागने लगे। हाथी-सेवकों ने हथवानों को खबर की ।
उन्होंने सोचा पानी में कुछ खतरा होगा। पानी खोज करने पर जब उन्होंने झाड़ी
में श्रेष्ठ हाथी की लेण्डी देखी तो समझ गए कि यही कारण रहा है। उन्होंने
चाटी मँगवाई और उसे पानी से भर, उसमें उसे घोल हाथियों के शरीर पर छिड़-
कवा दिया। शरीर सुगन्धित हो गए तब वह हाथी नदी में उतरकर नहाए ।
हथवानों ने राजा को यह समाचार सुना सलाह दी कि देव ! वह हाथी
खोजवाकर मँगवाया जाना चाहिए । राजा नौकाओं के बेड़े से नदी में उतर
ऊपर जानेवाले बेड़े से बढ़इयों के निवासस्थान पर पहुँचा। वह हाथी-बच्चा
नदी में खेल रहा था। जब उसने भेरी शब्द सुना तो जाकर बढ़इयों के पास
खड़ा हो गया। बढ़इयों ने राजा की अगवानी करते हुए कहा—देव ! यदि
लकड़ी की आवश्यकता थी, तो कष्ट क्यों किया ? क्या भेजकर मँगाना उचित
न होता ?
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