जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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विषय पृष्ठ
२२६ कोसिय जातक ३८८
[ समय पर घर से बाहर निकलना अच्छा है, असमय
पर नहीं । ]
२२७ गूहपाणक जातक ३६१
[ गूँह का कीड़ा गीले गूँह पर चढ़ा । वह उसके चढ़ने
से थोड़ा नीचे को दबा । गूँह का कीड़ा चिल्लाया—
पृथ्वी मेरा बोझ नहीं उठा सकती है । ]
२२८ कामनीत जातक ३६४
[ काम जातक (४६७) म । ब्रह्मचारी न राजा को
तीन राज्य जिला देन की बात कही । फिर वह चला
गया । राजा को लगा कि उसके हाथ में आए हुए तीन
राज्य चले गए । ]
२२६ पलासी जातक ३६८
[ वाराणसी नरेश ने तक्षशिला पर आक्रमण की
तैयारी की । किन्तु वह तक्षशिला नरेश की ड्योढ़ी
देखकर ही हिम्मत हार गया । ]
२३० द्वितिय पलासी जातक ४०१
[ तक्षशिला नरेश न वाराणसी नरेश पर आक्रमण की
तैयारी की । किन्तु वह वाराणसी नरेश के स्वर्णपट
सदृश महाललाट को देख कर हिम्मत हार गया । ]
६. उपाहन वर्ग ४०५
२३१ उपाहन जातक ४०५
[ शिष्य ने आचार्य से हस्ति शिल्प सीख उसी से
मुकाबला करना चाहा । ]
२३२ वीणथूण जातक ४०८
[ सेठ की लडकी न कुबडे की पीठ पर कूब देख कर
समझा यह पुरुषों म वृषभ होगा । ]