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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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सूकर ] १४६
क. वर्तमान कथा
एक दिन रात मे जब धर्म-देशना हो रही थी, जब शास्ता गन्धकुटी के
दरवाजे पर मणिमय सीढ़ी पर खडे होकर भिक्षुसघ को उपदेश दे गन्धकुटी में
चले गए थे, धर्मसेनापति (सारिपुत्र) शास्ता को प्रणाम कर अपने परिवेण में
गए । महामोग्गल्लान भी अपने परिवेण में जा, वहाँ थोड़ी देर विश्राम कर
स्थविर के पास चले आए और प्रश्न पूछने लगे । जो जो प्रश्न पूछा जाता
धर्म सेनापति आकाश मे चन्द्रमा को उठाते हुए से उसका उत्तर देकर समझा
देते । चारो प्रकार की परिषद् बैठी धर्म सुनती रही ।
एक बूढे स्थविर को सूझा—यदि में इस सभा मे सारिपुत्र से कोई प्रश्न
पूछकर उसे चकरा दूँ तो यह सभा समझेगी कि यह भी बहुश्रुत है और मेरा
सत्कार सम्मान करेगी । इसलिए उसने सभा मुँ से उठ सारिपुत्र के पास जाकर
एक तरफ खडे हो कहा—आयुष्मान् ! सारिपुत्र ! हम भी एक प्रश्न पूछना
चाहते हैं । हमें भी पूछने की आज्ञा दे । लपेटने के बारे मे, उधेडने के बारे मे,
निग्रह के बारे में, प्रग्रह के बारे मे, विशेष के बारे मे, तथा निर्विशेष के बारे मे
अपना निश्चय कहे ।१
स्थविर ने उसकी ओर देख सोचा—यह बूढा इच्छाओ के वशीभूत है,
तुच्छ है, कुछ नही जानता । वे उससे बिना कुछ बातचीत किए शरमाए हुए,
पंखे२ को रखकर आसन से उतर परिवेण में चले गए । मोग्गल्लान स्थविर
भी अपने परिवेण में चले गए ।
मनुष्यो ने उसका पीछा किया—पकडो इस बूढे को, इसने हमें मधुर
धर्मोपदेश नही सुनने दिया । यह भागता हुआ विहार के सिरे पर एक दरार
फटे पाखाने मे गिर पडा और गन्दगी से पुत गया । आदमियों को उसे देख
घृणा हुई । वे शास्ता के पास गए। शास्ता ने उन्हें देख पूछा—"उपासको !
क्यो असमय कैसे आए ?" मनुष्यो ने वह हाल कहा ।
१ यह प्रश्न निरर्थक शब्द-समूह मात्र है ।
२ धर्मोपदेश के समय पंखा हाथ में रहता है ।