जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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अक्कोधेन जिने कोधं, असाधुं साधुना जिने
जिने कदरियं दानेन सच्चेन अलिकवादिनं,
एतादिसो अयं राजा मग्गा उय्याहि सारथि¹ ॥
[ क्रोधी को अक्रोध से जीतता है। बुरे को भलाई से। कंजूस को दान
से। झूठे को सत्य से। यह राजा ऐसा है। इसलिए सारथि ! तू मार्ग
छोड़ दे। ]
एतादिसो, इन अक्कोधेन जिने कोध आदि कहे गए गुणों से युक्त। यह
क्रोधी आदमी को स्वयं शान्त रहकर अक्रोध को जीतता है। असाधु को स्वयं
भला होकर साधुता से। कदरियं, अत्यन्त कंजूस को स्वयं दाता बनकर दान से।
अलिक वादिन, झूठ बोलनेवाले को स्वयं सत्यवादी बनकर। सच्चेन जिनाति
मित्र सारथि ! मार्ग से हट जा। इस प्रकार के सदाचार से युक्त हमारे राजा
को मार्ग दे। हमारा राजा ही मार्ग पाने के योग्य है।
ऐसा कहने पर मल्लिक राजा तथा उसके सारथि, दोनों ने उतर कर,
घोड़ों को खोल रथ को हटा वाराणसी के राजा को मार्ग दिया। वाराणसी
राजा ने मल्लिक राजा को उपदेश दिया कि राजा को यह यह करना चाहिए !
फिर वाराणसी जा वहाँ दानादि पुण्य-कर्म करके जीवन समाप्त होने पर स्वर्ग-
मार्ग ग्रहण किया।
मल्लिक राजा ने भी उसका उपदेश ग्रहण कर जनपद में जा अपने दोष
बताने वाले को बिना खोजे ही अपने नगर पहुँच दानादि पुण्य-कर्म करके स्वर्ग
को प्रयाण किया।
शास्ता ने कोशल-नरेश को उपदेश देने के लिए यह धर्म-देशना ला जातक
का मेल बैठाया।
उस समय मल्लिक राजा का सारथि मोग्गल्लान था। राजा आनन्द था।
वाराणसी राजा का सारथि सारिपुत्र था। राजा तो मैं ही था।
¹ धम्मपद (१७।३)।