जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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राजा। वहाँ भी कोई दोष कहने वाला न मिला। प्रशंसा ही सुनने को मिली।
तब बोधिसत्व ने जनपद में खोजने का निर्णय किया। आमात्यों को राज्य संभाल
यह रथ पर चढ़ केवल सारथि को साथ ले भेष बदल नगर से निकला। जनपद में
खोजते हुए वह राज्य की सीमा तक चला गया। जब वहाँ भी उसे कोई दोष
दिखाने वाला नहीं मिला, प्रशंसा ही सुनाने वाले मिले तो प्रत्यन्त-देश¹ की
सीमा पर से महामार्ग से नगर की ओर लौटा।
उसी समय मल्लिक नाम का कोशल-नरेश भी धर्म से राज्य करता हुआ
अपने दोष कहने वाले को ढूंढने के लिए निकला था। जब उसे महल में अन्दर
रहने वालों आदि में कोई दोष कहनेवाला नहीं मिला, प्रशंसा करने वाले ही
मिले तो वह जनपद म खोजता हुआ वहाँ पहुँचा। ये दोनों गाड़ियों के एक
नीचे रास्ते पर आमने सामने हुए। रथों के लिए एक दूसरे को गुजरने देने की
जगह नहीं थी।
मल्लिक राजा के सारथि ने वाराणसी राजा के सारथि से कहा—अपने
रथ को लौटा ले।
वाराणसी राजा के सारथि ने कहा—तू अपने रथ को लौटा ले। मेरे
रथ म वाराणसी राज्य के स्वामी महाराज ब्रह्मदत्त बैठे हैं।
दूसरे ने भी कहा—इस रथ में कोशल राज्य के स्वामी मल्लिक महाराज
बैठे हैं। तू अपने रथ को मोड़ कर हमारे राजा के रथ को जगह दे।
वाराणसी राजा के सारथि ने सोचा—यह भी राजा है। अब क्या करना
चाहिए? उसे एक उपाय सूझा कि राजा की आयु पूछकर जो आयु में छोटा
होगा उसका रथ लौटवाकर जो बड़ा होगा उसके रथ के लिए जगह कर-
वाऊँगा। ऐसा निश्चय कर उसने दूसरे सारथि से कोशल राजा की आयु पूछी।
मिलान करने पर दोनों राजा समान आयु वाले निकले। फिर राज्य-विस्तार,
सेना, धन, यश, जाति, गोत्र, कुल-भेद आदि के बारे में पूछा। दोनों तीन तीन
सौ योजन राज्य के स्वामी निकले। दोनों की सेना, धन, यश, जाति, गोत्र
तथा कुल-भेद सब एक सदृश था। तब सोचा जो अधिक शीलवान् होगा उसे
¹ राज्य-सीमा के बाहर।