जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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“हम राजकुल में आने जाने वाले नहीं हैं, हम हिमवन्त निवासी हैं।”
आमात्य ने जाकर राजा से यह बात कही। राजा बोला—हमारे यहाँ
आने जाने वाला कोई भिक्षु नहीं है। उन्हें जाकर ले आओ।
आमात्य ने जा बोधिसत्त्व को प्रणाम कर, प्रार्थना कर, साथ लिवा राज-
भवन में पहुँचाया।
राजा ने बोधिसत्त्व को प्रणाम कर, श्वेत छत्र लगे हुए सोने के सिंहासन
पर बिठा, अपने लिए तैयार किए गए नाना प्रकार के भोजन खिलाकर
पूछा—'भन्ते ! कहाँ रहते हैं?'
'महाराज ! हम हिमवन्त-निवासी हैं।'
'अब कहाँ जा रहे हैं।'
'महाराज ! वर्षा-ऋतु के अनुकूल निवास स्थान की खोज है।'
'तो भन्ते ! हमारे ही उद्यान में रहें।'
उनसे स्वीकृति ले अपना भी भोजन समाप्त कर राजा बोधिसत्त्व के साथ
उद्यान गया। वहाँ पर्णशाला बनवा, उसमें रात के रहने योग्य तथा दिन में रहने
योग्य स्थान तैयार करवा, प्रव्रजितों की आवश्यकताएँ दे, उनकी सेवा आदि के
लिए उद्यानपाल को भार सौंप स्वयं नगर को लौटा। उस समय से बोधिसत्त्व
उद्यान में रहने लगे। राजा भी दिन में दो तीन बार उनकी सेवा में जाता।
उस राजा का दुष्ट कुमार नाम का पुत्र था। वह क्रोधी था, कठोर था।
न उसे राजा ही विनीत बना सका, न बाकी रिश्तेदार। आमात्यों और ब्राह्मण
गृहपतियों ने क्रुद्ध होकर इतना कहा कि 'हे स्वामी ! ऐसा न करें। ऐसा न कर
सकेंगे।' इतने से भी वह उसे कुछ न समझा सके।
राजा ने सोचा मेरे शीलवान् तपस्वी के अतिरिक्त कोई दूसरा इस कुमार
को विनीत नहीं बना सकता।
वह कुमार को बोधिसत्त्व के पास ले गया और उन्हें सौंपते हुए कहने लगा
—भन्ते ! यह कुमार क्रोधी है, कठोर स्वभाव का है। हम इसे विनीत नहीं
कर सकते। आप इसे किसी ढंग से शिक्षा दें। इतना कह चला गया।
बोधिसत्त्व ने कुमार के साथ उद्यान में घूमते हुए नीम का एक पौधा देखा
जिसके एक ओर एक पत्ता, दूसरी ओर दूसरा पत्ता—इस प्रकार कुल दो पत्ते
थे। बोधिसत्त्व ने कुमार से कहा—कुमार ! इस पौधे के पत्ते खाकर इसका