जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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जाते हैं। रोग से मुक्त न हो सकने के कारण नित्य दुखी रहते हैं। इसलिए
सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भावना रखनी चाहिए। सभी का हित चिन्तक
होना चाहिए। सभी के प्रति कोमल चित्त वाला होना चाहिए। क्योकि इस
प्रकार का (क्रोधी) आदमी नरक आदि के भय से मुक्त नहीं होता।
वह कुमार शास्ता का एक ही उपदेश सुनकर मान-रहित हो गया, शान्त
इन्द्रिय हो गया, क्रोध-रहित हो गया, मैत्री-चित्त वाला हो गया तथा कोमल
चित्त का हो गया। उसे कोई गाली देता, मारता तो भी वह उसकी ओर रुख कर
न देखता। वह ऐसा सांप हो गया जिसके दांत उखाड़ दिए गए हों, ऐसा केकड़ा
हो गया जिसके डंक जाते रहे हों, ऐसा बैल हो गया जिसके सींग न हों।
उसका समाचार जानकर भिक्षुओं ने धर्म-सभा में बातचीत चलाई—
आयुष्मानो ! दुष्ट लिच्छवि कुमार को चिर काल तक उपदेश देते रहकर भी
न माता पिता न रिश्तेदार-मित्र आदि ही उसे विनीत बना सके। सम्यक्
सम्बुद्ध ने उसे एक ही उपदेश से ऐसा कर दिया जैसे किसी मस्त हाथी को शान्त
कर दिया हो। यह ठीक ही कहा गया है—भिक्षुओ ! हाथी-दमन करने
वाला खूब हाथी को दमन करता है तो दमन किया हुआ हाथी एक ही दिशा में
दौड़ता है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे पश्चिम दिशा में, चाहे उत्तर दिशा में अथवा
दक्षिण में। भिक्षुओ, घोड़ा-दमन करनेवाला जब घोड़े को दमन करता है
तो दमन किया हुआ घोड़ा एक ही दिशा में दौड़ता है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे
पश्चिम में, चाहे उत्तर में, अथवा दक्षिण में। भिक्षुओ, बैल को दमन करने
वाला जब उसे दमन करता है, तो दमन किया हुआ बैल एक ही दिशा में दौड़ता
है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे पश्चिम में, चाह उत्तर में अथवा दक्षिण में। लेकिन
भिक्षुओ, जिसे तथागत अर्हत्सम्यक् सम्बुद्ध शिक्षित करते हैं वह आठ दिशाओं
में जाता है रूपवान् रूपों को देखता है, यह एक दिशा है • सञ्ज्ञा तथा संज्ञा
का जो निरोध है उसे प्राप्त कर विचरता है, यह आठवीं दिशा है। वह दिशाओं
में अनुपम पुरुष-दम्य-सारथि कहलाते हैं।¹ आयुष्मानो ! सम्यक् सम्बुद्ध
के समान पुरुषों का दमन करनेवाला सारथि नहीं है।
¹ मज्झिम निकाय (३)