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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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१२८ [ १.१५.१४६
तथा हि भय तज्जितो, मैं इसी बार प्रवेश करने से भी भयभीत हो गया; मरण
भय से त्रास को तथा उद्विग्नता को प्राप्त हुआ।
इतना कह और वहाँ से भाग फिर उस अथवा अन्य किसी भी हाथी के
शरीर को खड़े होकर देखा तक नहीं। उस के बाद से लोभ के वशीभूत नहीं हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला कर कहा—भिक्षुओ, अन्दर जो मैल पैदा
हो जाए उस चित्त के मैल को बढ़ने न देकर वही निग्रह करना चाहिए। इतना
कह आर्य-सत्यों का प्रकाशन कर, जातक का सारांश निकाला। सत्यों का
प्रकाशन समाप्त होने पर वह पाँच सौ भिक्षु अर्हत् हो गए। शेष में से कुछ
श्रोतापन्न, कुछ सकृदागामी तथा कुछ अनागामी हुए।
उस समय सियार तो मैं ही था।

१४६. एकपण्ण जातक

“एक पण्णो अयं रुक्खो...” यह शास्ता ने वैशाली के पास महावन की
कूटागार शाला में रहते हुए वैशाली के एक दुष्ट-स्वभाव लिच्छवि-कुमार के
बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

उस समय वैशाली में गावुत गावुत¹ की दूरी पर तीन प्राकारें बनी थीं।
तीनो जगहों पर गोपुर थे, अट्टालिकाएँ थीं तथा कोठे थे। इस प्रकार अत्यन्त
शोभायमान था।

¹ गव्यूति=२ मील।