सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 14

[ १८ ]
विषय पृष्ठ
१९५ पब्बत्तूपत्थर जातक २८६
[ राजा की रानी को उसके आमात्य ने दूषित कर
दिया। राजा ने विचार कर दोनो को क्षमा कर दिया। ]
१९६ वालाहस्स जातक २९१
[ यक्षिणियां व्यापारियो को फँसाकर यक्ष नगर ले
जाती। पाँच सौ व्यापारी उनके चगुल म फँस गए। ज्येष्ठ
व्यापारी को पता लगा कि यह यक्षिणियाँ हैं। उसने सब को
भाग चलने को कहा। ढाई सौ व्यापारी ज्येष्ठ व्यापारी
का कहना मान बच निकले। कहना न मानने वाले दो
ढाई सौ व्यापारी यक्षिणियो के आहार बने । ]
१९७ मित्तामित्त जातक २९५
[ मित्र या अमित्र कैसे पहचाना जा सकता है ? ]
१९८ राध जातक २९७
[ पोट्ठपाद ने ब्राह्मणी को दुराचार से विरत रहने का
उपदेश दिया। उसने विचारे तोते की गरदन मरोड उसे
चूल्हे में फेंक दिया। ]
१९९ गहपति जातक ३००
[ ब्राह्मणी और गाँव का मुखिया मिलकर ब्राह्मण को
धोखा देना चाहते थे। वे अपने दुराचार को न छिपा
सके। ]
२०० साधुसील जातक ३०३
[ एक ब्राह्मण की चार लडकियां थी। उसने आचार्य
से पूछा—लड़कियाँ किसे देना योग्य है ? ]
६. नतंदळ्ह वर्ग ३०६
२०१ बन्धनागार जातक ३०६
[ पुत्र दारा का बन्धन सब से बडा बन्धन है । ]