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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से
महासमुद्र की कोख भर जाए।
तब बोधिसत्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए
दिव्य रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना
मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई।
इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही—
कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च
अवत्थितत्ताभयभीरुताय च,
न रक्खसीन वसमगमिरम्हा
स सोत्थिभावो महता भयेन मे ॥
[ सदुपदेश पर दृढता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन मे
स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। में बडे भारी भय से
बच गया (सकुशल रहा)।]

कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से, प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार
(चलकर)। धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से या स्थिर अखण्डित वीर्य्य से।
अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय
कहते हे चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कँपा देनेवाला भय। यह
दोनो बोधिसत्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती हैं—
इस भय के कारण के उत्पन होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि-
तत्ताभयभीरुताय च। भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण
उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से। नरक्खसीन वसमगमिरम्हा, यक्ष-
कान्तार में उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी
स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए,
इसलिए राक्षसियो के वश में नही आए--यही भाव है। स सोत्थि भावो
महता भयेन मे सो आज मुझयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले
दु ख दोर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।