इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextरखने वाले पुरुषों, आपको इस विज्ञान को अपनाना; समझना और क्रियात्मक रूप देना होगा।
जिस प्रकार उपवन एक ही सुगन्धित पुष्प वाले पौधे से सुवासित हो जाता है उसी प्रकार विद्वान्, सुशील, गुणवान् एक ही पुत्र से सारा परिवार।
एकोऽपि गुणवान् पुत्रो निगुणैश्च शतैर्वरः।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः॥
चाणक्य नीति ४/६
अर्थ- सैकड़ों गुण रहित पुत्रों के अपेक्षा एक ही गुणवान् पुत्र श्रेष्ठ है, एक ही चन्द्रमा अन्यकार को नष्ट कर देता है, सहस्रों तारे नहीं।
यादृशं तृष्यते बीजं क्षेत्रे कालीपपादिते।
तादृग्रीहति तत्तस्मिन्बीजं स्वैव्यञ्जितं गुणैः॥
मनु ९/३६
अर्थ- जिस प्रकार का बीज उचित समय (वर्षादि ऋतु) में संस्कृत खेत में बोया जाता है उसी प्रकार का ही बीज अपने रंग-रूपादि गुणों से युक्त उस खेत में उत्पन्न होता है।
जिस भावना से जितना पुष्ट और शुद्ध वीर्य को उचित ऋतुकाल में स्त्री रूपी खेत में पुरुष वीर्य सेचन करेगा उसी भावना का बच्चा उत्पन्न होगा। जिस प्रकार भूमि में गेहूँ, चना, जौ, तिल, गन्ना आदि सब जैसे-जैसे बीज होते हैं वैसे ही उत्पन्न होते हैं। यह नहीं होता कि बोया कुछ जाय और उत्पन्न कुछ और हो। जो-जो बोया जाता है वही-वही उत्पन्न होता है। इसी प्रकार यह नहीं हो सकता कि माता-पिता को काम के वशीभूत होकर भोग करें और सन्तान उत्तम, विद्वान् चाहें। भला यह तो किसी बुद्धिहीन से भी मालूम करो तो यही कहैगा कि बबूल बो कर आम खाने को नहीं मिल सकते, मिलेंगे तो कांटे ही मिलेंगे। क्योंकि प्रधानता बीज की होती है न कि भूमि की। बीज से ही सारे जीवों की उत्पत्ति
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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