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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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ऊपर को खींची जा रही है, परन्तु मूलबन्ध बराबर लगा रहे, सरलता से जितनी देर श्वास रुक सकें उतनी देर तक पेट की गति का अभ्यास करते रहें, तत्पश्चात् पेट की गति को रोक कर जिस नथने से श्वास खींची है उसे अंगुली या अंगूठे से बन्द करके दूसरे नथने से धीरे धीरे श्वास को बाहर निकाल दो, नाक से हाथ हटाकर जितनी देर हो सकें श्वास को बाहर ही रोको। मूलबन्ध लगा रहे और पेट को भी गति नहीं देनी। यह एक प्राणायाम हुआ। इसी प्रकार चलते नथने से पुनः श्वास-खींचकर पूर्ववत् क्रिया करें, इस प्रकार तीन प्राणायाम करें। जब भली प्रकार गुदा का संकोचन होने लगे तो प्राणायाम की संख्या बढ़ाते जायें। गुदा संकोचन से ही वीर्य का स्तम्भन होता है और गुदा के ढीले रहने से ही स्वप्नदोष एवं वीर्यपातादि होते हैं। अतः जब गुदा संकोचन द्वारा वश में होगी तो वीर्य में पूर्ण स्तम्भन होगा। इस साधन में जितना मनसा, वाचा, कर्मणा, स्त्री प्रसंग से दूर रहेंगे उतना ही शीघ्र लाभ होगा। जब एक बार इस साधन को सिद्ध कर चुके हैं तो आयु पर्यन्त स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, शुक्रमेह आदि सारे वीर्य सम्बन्धी दोषों से आपको मुक्ति मिल जायगी और दिन प्रतिदिन आपका स्वास्थ्य, आयु, बल और बुद्धि में विकास होता रहेगा। यदि साधन समय में पेट के नलों में पीड़ा होने लगे तो शुद्ध देशी घी गर्म करके मलें या पिसी हल्दी की कपड़े में पोटली बीचकर गर्म करके उसकी टकोरें दें। ध्यान रहे साधन काल में सुपाच भोजन लें, मिर्च, खटाई और तेज पदार्थों का त्याग करें।


इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri