इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextपहूँचाने वाले जितने विष शरीर में पैदा होते हैं उनमें सबसे अधिक विष विषावरोग (मल वेग के रोकने) से होता है। मल जब तक पूर्ण रूप से साफ होता रहता है तो मनुष्य सतेज और स्फूर्तियुक्त रहता है। जहाँ मल रुका सोई अन्य व्याधियाँ हुई कि मानव शरीर निस्तेज हो अनेक रोग जाल में फँस जाता है। किसी ने सत्य कहा है— प्रतिदिन दस्त साफ हो और खुलकर भूख लगे, इससे बढ़कर और क्या स्वस्थता होती है। मल त्याग की इच्छा होते ही मल का त्याग करना चाहिए, उस समय को किसी भी कार्य में न टालना चाहिए। जब शरीर में मल रुक जाता है तो वायु दूषित होती है जो पेट से न निकल कर पेट में ही भरने लगती है जिससे आध्यान होता है और हृदय पर दबाव पड़ता है। जिससे प्रतिशय्य अस्थि शोथादि होते हैं। उदरस्थ मल सूखकर पत्थर के समान कठोर हो जाता है जो सुगमता से फिर बाहर नहीं आ सकता। अर्श और उदर में भारीपन होकर अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। थोड़ी गर्मी और सर्दी सहन नहीं होती, सदा सिर में दर्द रहता है, इसका प्रभाव शनैः शनैः मन पर होने लगता है। थोड़ा-सा परिश्रम भी अधिक भार रूप अनुभव होता है। मन हर समय शोक और चिन्तित रहता है आनन्द एकदम विलीन हो जाता है, धीरे-धीरे रक्त और त्वचा भी दूषित होने लगती है। यह सब उपद्रव तभी होते हैं जब द्तिहित संयोग विरुद्ध पदार्थों का सेवन किया जाय और समय पर शौच के लिए न जाया जाय और मल वेग को रोक कर अन्य कार्य में लग जाय। शौच का समय निश्चित कर लें। उस समय इच्छा हो या न हो शौच अवश्य ही जाना चाहिए जिससे आँतों को अश्यास पड़ जाये। पेट में विबन्ध (कब्ज) हो जाने पर भोजनोपरान्त दोनों समय दो नग अजीर और सात नग मुनक्का खाना चाहिए। इससे भोजन शीघ्र पचता है और पेट का मल भी साफ होकर शरीर हल्का रहता है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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