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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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को और ध्यान रखना चाहिये।

वात प्रकोप-कटु, तीक्ष्ण कपैला, रूखी, हल्की थोड़ी वस्तु और बासी (रात्रि का रहा हुआ) अन्न भक्षण, संध्याकालिक मैथुन, शोक, भय, अति परिश्रम, प्रहार, अन्न-जल का परित्याग, अजीर्ण, १४ वेगों के प्रतिरोध, (मल, मूत्र, आँसू आदि वेगों का रोकना) और जल में तैरने से वायु कृपित होती है और उसके यत्नों से शान्त होती है।

पित्त प्रकोप- तिल, काँजी, मध, दही, कटु, तीक्ष्ण नमक, खटाई के भक्षण, शरद ऋतु में अधिक धूप में प्रमण, क्रोध, उपवास, तृष्णा, क्षुधा व रोध और अजीर्ण के होने से, मध्यादि, तथा अर्द्ध-रात्रि में शरद ऋतु के समय पित्त कृपित होता है और उसके यत्न से शान्त होता है।

कफ प्रकोप- दही, दूध, नवीन अन्न, शीतल जल, खटाई, नौन, घी, तिल, भारी वस्तु और मीठी वस्तु भक्षण, दिन में निद्रा, प्रातःकाल ही भोजन करने से कफ कोप को प्राप्त होता है और उसके यत्नों से शान्त होता है। अतः आहार-विहार पर सदैव ध्यान रखना चाहिए।


ऋतु आहार-विहार

वसन्त- इस ऋतु में कृपित कफ रोगों को पैदा कर अग्नि को मन्द कर देता है। इसलिए इस ऋतु में मधु युक्त हर सेवन करें चित्रक चूर्ण तथा कफ हारी पदार्थ सेवन करें।

ग्रीष्म- ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपने तेज से प्राणी मात्र का बल हर लेता है इसलिए खस आदि के पदें लगे हुए शीतल स्थान में तथा वृक्षों की सघन छाया में फूहारे आदि के समीप निवास करना, गुड़ युक्त हर, मधुर भोजन, दाख, क्षार, सत्तु, मिश्री, अनार

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri