हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
Hitopadesha (with Hindi Translation)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context२२० | हितोपदेशः | [ संधिः ८-
कश्चिद्वदति—'यद्ययं कूर्मः पतति तदाऽत्रैव पक्त्वा खादितव्यः।'
कश्चिद्वदति—'अत्रैव दग्ध्वा खादितव्योऽयम्।' कश्चिद्वदति—
'गृहं नीत्वा भक्षणीयः' इति। तद्वचनं श्रुत्वा स कूर्मः कोपाविष्टो
विस्मृतपूर्वसंस्कारः प्राह—'युष्माभिर्भस्म भक्षितव्यम्।' इति
वदन्नेव पतितस्तैर्व्यापादितश्च। अतोऽहं ब्रवीमि—"सुहृदां
हितकामानाम्" इत्यादि॥' अथ प्रणिधिर्बकस्तत्रागत्योवाच—
'देव! प्रागेव मया निगदितम्। दुर्गशोधनं हि प्रतिक्षणं कर्तव्य-
मिति। तच्च युष्माभिर्न कृतं तदनवधानस्य फलमनुभूतम्।
दुर्गदाहो मेघवर्णेन वायसेन गृध्रप्रयुक्तेन कृतः।'
'उत्तर दिशामें गृध्रकूटक नाम पर्वत पर एक बड़ा पीपलका पेड़ है। उस पर
बहुतसे बगले रहते थे। उस वृक्षके नीचे बिलमें एक साँप बगुलोंके छोटे छोटे
बच्चोंको खा लिया करता था। फिर शोकसे व्याकुल बगुलोंके विलापको सुन कर
किसी बगुलेने कहा—'ऐसा करो। तुम मछलियोंको ले कर नेवलेके बिलसे साँपके
बिले तक लगातार फैला दो। फिर उनको खानेके लोभी नेवले वहाँ आ कर साँपको
देखेंगे और अपने स्वभावके वैरसे उसे मार डालेंगे। ऐसा करने पर वैसा ही
हुआ। पीछे उस वृक्षके ऊपर नेवलोंने बगुलोंके बच्चोंका चहचहाट सुना। फिर
उन्होंने पेड़ पर चढ़ कर बगुलोंके बच्चे खा लिये। इसलिये हम दोनों कहते हैं कि
"उपायको सोचना चाहिये" इत्यादि। और हम दोनोंसे ले जाते हुए तुमको देख
कर लोग कुछ कहेंगेही। वह सुन कर जो तुम उत्तर दोगे तो तुम मरोगे। इस-
लिये चाहे जो कुछ भी हो, पर यहाँ ही रहो।' कछुआ बोला-'क्या मैं मूर्ख हूँ?
मैं उत्तर नहीं दूँगा। कुछ न बोलूँगा। और वैसा करने पर कछुएको वैसा देख
कर सब ग्वाले पीछे दौड़े और कहने लगेः कोई कहता था-जो यह कछुआ गिर
पड़े तो यहाँ ही पका कर खा लेना चाहिये। कोई कहता था—यहाँ ही इसे भून
कर खा लें। कोई कहता था कि घर ले चल कर खाना चाहिये। उन सभीका
वचन सुन कर वह कछुआ क्रोधयुक्त हो कर पहले उपदेशको भूल कर बोला—
'तुम सभीको धूल फाँकनी चाहिये।' यह कहतेही गिर पड़ा और उन्होंने मार
डाला। इसलिये मैं कहता हूँ—"हितकारी मित्रोंका" इत्यादि।' फिर दूत बगुला
वहाँ आ कर बोला-'हे महाराज! मैंने तो पहले ही जता दिया था कि गढ़का