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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

Page 128 of 302

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Page 128

१०८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ७७-
और दूसरे—असमर्थ भक्तसे अथवा अपकारी समर्थसे क्या प्रयोजन निकलता
है ? सो हे राजा ! मेरे समान भक्त और काम करनेमें समर्थका अपमान आपको
नहीं करना चाहिये ॥ ७६ ॥
यतः,—
अवज्ञानाद्राज्ञो भवति मतिहीनः परिजन-
स्ततस्तत्प्रामाण्याद्भवति न समीपे बुधजनः ।
बुधैस्त्यक्ते राज्ये न हि भवति नीतिर्गुणवती
विपन्नायां नीतौ सकलमवशं सीदति जगत् ॥ ७७ ॥
क्योंकि राजाके अपमान करनेसे आपसके ( परिवारी ) लोग बुद्धिहीन हो जाते
हैं, पीछे उसके प्रमाणसे ( अर्थात् मेराभी यह अपमान करेगा यह सोच कर )
पण्डितजन उसके पास नहीं आते हैं । पण्डितोंसे छोड़े हुए राज्यमें नीति दोष-
रहित नहीं होती है, और नीतिके बिगड़नेसे सब संसार बेवश होकर नष्ट हो
जाता है ॥ ७७ ॥
अपरं च,—
जनं जनपदा नित्यमर्चयन्ति नृपार्चितम् ।
नृपेणावमतो यस्तु स सर्वैरवमन्यते ॥ ७८ ॥
और दूसरे—राजासे सन्मान किये हुए मनुष्यकी प्रजा सर्वदा आदर करती है
और राजासे अपमान किये गये ( पुरुष ) का सब अपमान करते हैं ॥ ७८ ॥
किं च,—
बालादपि ग्रहीतव्यं युक्तमुक्तं मनीषिभिः ।
रवेरविषये किं न प्रदीपस्य प्रकाशनम् ?' ॥ ७९ ॥
और पण्डितोंको बालकसेभी योग्य बात ग्रहण करनी चाहिये, जैसे सूर्यके
नहीं निकलने पर क्या दीपकका उजाला नहीं होता है ? ॥ ७९ ॥
पिङ्गलकोऽवदत्—'भद्र दमनक ! किमेतत् ? त्वमस्मदीयप्रधा-
नामात्यपुत्र इयन्तं कालं यावत्कुतोऽपि खलवाक्यान्नागतोऽसि ?
इदानीं यथाभिमतं ब्रूहि ।' दमनको ब्रूते—'देव ! पृच्छामि
किंचित् । उच्यताम् । उदकार्थी स्वामी पानीयमपीत्वा किमिति
विस्मित इव तिष्ठति ?' । पिङ्गलकोऽवदत्—'भद्रमुक्तं त्वया ।
किंन्त्वेतद्रहस्यं वक्तुं काचिद्विश्वासभूमिर्नास्ति । तथापि निभृतं