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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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-६६ ] बडे पुरुषको भी छोटीसी चीजकी जरूरी होना १०५
तद्भद्र ! अनुजानीहि माम् । गच्छामि' । करटको ब्रूते- 'शुभ-
मस्तु । शिवास्ते पन्थानः । यथाभिलषितमनुष्ठीयताम्' इति । ततो
दमनको विस्मित इव पिङ्गलकसमीपं गतः ।
इसलिये हे शुभचिन्तक ! मुझे आज्ञा दीजिये । मैं जाता हूं ।' करटकने
कहा-'कल्याण हो । और तुम्हारे मार्ग विघ्नरहित अर्थात् शुभ हो । अपना
मनोरथ पूरा करो !' तब दमनक घबराया-सा पिंगलकके पास गया ॥
अथ दूरादेव सादरं राज्ञा प्रवेशितः साष्टाङ्गप्रणिपातं प्रणि-
पत्योपविष्टः । राजाह-'चिराद्दृष्टोऽसि' । दमनको ब्रूते-'यद्यपि
मया सेवकेन श्रीमद्देवपादानां १ न किंचित्प्रयोजनमस्ति, तथापि
प्राप्तकालमनुजीविना सांनिध्यमवश्यं कर्तव्यमित्यागतोऽस्मि ।
तब दूरसेही बड़े आदरसे राजाने भीतर आने दिया और वह साष्टांग दंडवत
करके बैठ गया । राजा बोला-'बहुत दिनसे दीखे ।' दमनक बोला-'यद्यपि मुझ
सेवकसे श्रीमहाराजको कुछ प्रयोजन नहीं है तोभी समय आने पर सेवकको
अवश्य पास आना चाहिये, इसलिये आया हूं;
किं च,—
दन्तस्य निर्घर्षणकेन राजन् !
कर्णस्य कण्डूयनकेन वापि ।
तृणेन कार्यं भवतीश्वराणां
किमङ्गवाक्पाणिमता नरेण ॥ ६६ ॥
और-हे राजा ! दांतके कुरेदनेके लिये तथा कान खुजानेके लिये राजाओंको
तुनकेसेभी काम पड़ता है फिर देह, वाणी तथा हाथ वाले मनुष्यसे क्यों नहीं ?
अर्थात् अवश्य पड़ताही है ॥ ६६ ॥
यद्यपि चिरेणावधीरितस्य देवपादैर्मे बुद्धिनाशः शङ्क्यते, तदपि
न शङ्कनीयम् ।
यद्यपि बहुत कालसे मुझ अनादर किये गयेकी बुद्धिके नाशकी श्रीमहाराज
शंका करते हो सोभी शंका न करनी चाहिये,
१ यहां पाद अर्थात् चरणोंका शब्द केवल प्रतिष्ठाके लिये है ।