हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
by महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि
Page 441 of 548
Read in contextकार्य्यं मर्मस्थानञ्च वर्जयेत् ॥ सैन्धवेन घृतेनापि कुर्य्यात्त-
स्यानुलेपनम् ॥ ५ ॥ सूरणं कन्दकं दग्ध्वा घृतेन च गुडेन
च ॥ लेपनं चार्बुदानाञ्च नाशनञ्च भिषग्वर ॥ ६ ॥ शेषा
व्रणक्रिया प्रोक्ता शस्ता वार्बुदशान्तये ॥ वातघ्नानि च पथ्यानि
हितानि मधुराणि च ॥७॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृती-
यस्थाने अर्बुदचिकित्सानाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-चोटके अभिघातसे और वायुसे तथा व्रणसे रक्तकी नाड़ी भरजाती
और रुकजाती है ॥ १ ॥ उससे रक्तका मार्ग रुकजाता है सो मार्गके रुकनेसे महास्थूल
अर्बुदरोग हो जाता है ॥ २ ॥ वातसे उपजा अर्बुद रोग कोमल हो और खरदरा हो और
कफसे कडा और शीतल होता है और पित्तसे उपजेमें दाह और पाक होता है ऐसा वैद्यजनोंको
जानना चाहिये ॥ ३ ॥ सन्निपातसे उपजा कठिन और पत्थरके समान कड़ा होता है
हे वैद्यजन! बढनेवाला और गोलीसरीखा यह अर्बुदरोग असाध्य होता है॥४॥उस रोगकी आदिमें
मर्मस्थानको वर्जके फाडनेकी विधि करनी चाहिये पीछे सैंधानमक घृत इनका लेप करना चाहिये
॥ ५ ॥ जमीकंदको दग्ध कर घृत और गुडमें मिला लेप करनेसे अर्बुदरोगोंका नाश होतां है
॥ ६ ॥ बाकीकी व्रणमें कही हुई क्रिया करनी यह श्रेष्ठ है और वातको नाश करनेवाले मधुर
पदार्थ हित कहे हैं और पथ्य हैं ॥ ७ ॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने अर्बुदचिकित्सानाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
अष्टत्रिंशोऽध्यायः ३८.
अथ लूत तथा गंडमाला रोगका निदान और लक्षण ।
आत्रेय उवाच ॥ इति व्रणक्रिया प्रोक्ता समासेन भिषग्वर ॥
यथायोगं चोपचारं ज्ञात्वा सम्यगुपाचरेत् ॥१॥ दुष्टाम्बुपानक
कद्वन्ननिषेवणाच्च संजायते चक्रमिसम्भवगण्डमाला॥सामारुते
च कफपित्तभवे विकारे संसर्पते क्रिमिजदोषगणश्च गण्डात्॥२॥
वातेन वातसदृशानि च लक्षणानि पित्तेन दाहसरुजव्रणशोष-