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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

Page 86 of 600

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Page 86

४८ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २८ ॥
वाला शिक्षा योग्य व्याकरण है [अर्थात् चौबीस भाग में व्याकरण विषय है]। (अथ
उत्तरौ द्वौ द्वादशकौ वर्गौ वेदरहसिकी व्याख्याता) और पिछले दो बारह बारह के
वर्ग [द्विवचन = एकवचन, अर्थात् पिछला एक द्वादशक] है, [इनमें] वेदरहसिकी
[वेदों की निर्जन स्थान में विचारने योग्य विद्या] बतलायी गयी है। (मन्त्रः कल्पः
ब्राह्मणम् ऋग् यजुः साम अथर्वाणि एषा व्याहृतिः) मन्त्र [गूढ़ विचार] में, कल्प में
ब्राह्मण ग्रन्थ में, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में यह [ओम्] व्याहृति है,
१-८। (चतुर्णां वेदानाम् आनुपूर्व्येण ओम् भूः भुवः स्वः इति व्याहृतयः) चारों
वेदों की क्रम से ओम् भूः, भुवः, स्वः, व्याहृतियां हैं, ६--१२ [मिलान करो कण्डिका ६
तथा १७-२१]। २७ ॥
भावार्थ:--मनुष्य व्याकरण आदि से ओम् शब्द के अर्थों को एकान्त में विचार
कर विघ्नों को हटाकर आनन्द भोगे । २७ ॥
विशेष:--कण्डिका २४ के सब ३६ प्रश्नों के उत्तर कण्डिका २६ और २७ में हैं।
हमारी समझ में ठीक ठीक नहीं बैठे, पाठक जन विचार लें ॥
कण्डिका २८ ॥
असमीक्षप्रवल्हितानि श्रूयन्ते द्वापरादावृषीणामेकदेशो दोषपतिरिह
चिन्तामापेदे त्रिभिः सोमः पातव्यः समाप्तमिव भवति तस्मादृग्यजुःसामान्य-
पकन्तेजांस्यासंस्तत्र महर्षयः परिदेवयाञ्चक्रिरे महच्छोकभयं प्राप्ताः स्मो न
चैतत् सर्वैः समभिहितं ते वयं भगवन्तमेवोपधावाम सर्वेषामेव शर्म भवानीति
ते तथेत्युक्त्वा तूष्णीमतिष्ठन्नानुपसंग्रभ्य इत्युपसीदामीति नीचैर्बभूवुः। स
एभ्य उपनीय प्रोवाच मामिकामेव व्याहृतिमादितः आदितः कृणुध्वमित्येवं
मामका आधीयन्ते।
नर्ते भृग्वङ्गिरोविद्भ्यः सोमः पातव्य ऋत्विजः पराभवन्ति यजमाना
रजसापध्वस्यति श्रुतिश्चापध्वस्ता तिष्ठतीत्येवमेवोत्तरोत्तराद्योगात्तोकं तोकम्प्र-
शाश्वमित्येवं प्रतापो न पराभविष्यतीति तथा ह तथा ह भगवन्निति प्रतिपेदिर
आप्याययंस्ते तथा वीतशोकभया बभूवुः। तस्माद् ब्रह्मवादिन ओंकारमादितः
कुर्वन्ति ॥ २८ ॥
कण्डिका २८ । ओम् को आदि में बोलने का वर्णन ॥
(असमीक्षप्रवल्हितानि श्रूयन्ते) विचारशून्य उड़ाऊ बातें सुनी जाती है-
(द्वापरादौ ऋषीणाम् एकदेशः दोषपतिः इह चिन्ताम् आपेदे त्रिभिःसोमः पातव्यः
समाप्तम् इव भवति) द्वापर के आरम्भ में ऋषियों के बीच एक देश का रहने वाला
निश्चययेन (वेदरहसिकी) वेदानां रहस्या निर्जनदेशे विचारणीया विद्या (शंक्ष्यम्)
शिक्षा--ण्यत् । शिक्षणीयम् ॥
९८-(असमीक्षप्रवल्हितानि) न+सम्+ईक्ष दर्शने-घञ्, प्र+ह्वल
चलने-क्तः । समीक्षण पर्यालोचनेन विना प्रर्चलितानि वचांसि (दोषपतिः)