गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in contextगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६। क० ६॥ ५०९
( सः यत् पुरुषः अन्यथा एव प्रत्यङ् भवति, अन्यथा प्राङ् भवति, तस्मात् द्व्युक्थः)
सो जो पुरुष एक प्रकार से ही पीछे की ओर होता है और दूसरे प्रकार से सामने की
ओर, इसलिये वह [ होता ] दो उक्थ वाला है। ( अङ्गानि वाव होत्राः, तानि वै
एकैकं, तस्मात्, एकोक्थाः ) अङ्गों [ के समान ] ही होत्रक लोग हैं, वे [ अङ्ग ] ही
एक एक हैं, इसलिये वे [ होत्रक ] एक उक्थ वाले हैं। ( तत् यत् एकैकम् अङ्गं द्युतिः
भवति, तस्मात् द्विसूक्ताः ) उस [ पुरुष ] का जो एक एक अङ्ग [ जैसे हाथ और पांव ]
दो अवयव वाला होता है, इसलिये वे [ होत्रक ] दो सूक्त वाले होते हैं ॥
( तत् आहुः, यत् द्व्युक्थः एकसूक्तः होता, एकोक्थाः द्विसूक्ताः होत्राः, कथं
तत्,समं भवति ) वे कहते हैं—जो दो उक्थ वाला और एक सूक्त वाला होता है, और
एक उक्थ वाले और दो सूक्त वाले होत्रक होते हैं, कैसे यह कर्म समान होता है। ( यत्
एव द्विदेवत्याभिः यजन्ति, अथो यत् द्विसूक्ताः होत्राः इति ब्रूयात् ) जब ही दो
देवता वाली ऋचाओं से यज्ञ करते हैं, और जब दो उक्थ वाले होत्रक हैं, वह यह बतलावे ।
( तत् आहुः यत् अग्निष्टोमे एव यज्ञे सति होतुः द्वे उक्थे अतिरिच्येते कथं त :
होत्राः न व्यवच्छिद्यन्ते इति ) जब अग्निष्टोम ही यज्ञ होने पर होता के दो उक्थ
बढ़ते हैं, कैसे उससे होत्रक लोग नहीं अलग अलग होते। ( यत् एव द्विदेवत्याभिः यजन्ति,
अथो यत् द्विसूक्ताः होत्राः इति ब्रूयात् ) [ उत्तर ] जब ही दो देवता वाली ऋचाओं से
वे यज्ञ करते हैं, फिर जब दो सूक्त वाले होत्रक हैं [ इसलिये वे अलग अलग नहीं होते ]—
यह कहे। ( तत् आहुः यत् अग्निष्टोमे एव यज्ञे सति सर्वाः देवताः सर्वाणि छन्दांसि
आप्याययन्ति, अथ कतमेन छन्दसा कया देवतया अयातयामानि उक्थानि प्रणयन्ति
इति ) वे कहते हैं-जब अग्निष्टोम ही यज्ञ होने पर सब देवताओं और सब छन्दों को वे
बढ़ाते हैं, फिर कौन से छन्द से और किस देवता से समय के अनुकूल उक्थों को वे आगे
लाते हैं। ( गायत्रेण छन्दसा अग्निना देवतया इति ब्रूयात् ) गायत्री छन्द से और
अग्नि देवता से [ समय के अनुकूल उक्थों को वे आगे लाते हैं ]—ऐसा वह कहे। ( यज्ञं
तन्वानान् देवान् ह असुररक्षांसि यज्ञपर्वणि अभिचेरिरे, एषां यज्ञं तृतीयसवनं
प्रति हनिष्यामः ) यज्ञ फैलाते हुये देवताओं से असुर और राक्षस यज्ञ के उत्सव में
अभिचार [ छल प्रयोग ] करने लगे-इनके यज्ञ को तीसरे सवन में हम नष्ट कर देंगे,
( तृतीयसवने ह अरिष्टः यज्ञः तु बलिष्ठः, एषां प्रतनं यज्ञं हनिष्यामः इति )
तीसरे सवन में ही बिना बिगड़ा हुआ यज्ञ अति बलवान् होता है, इनके फैले हुए यज्ञ को
हम नष्ट कर देंगे । ( ते दक्षिणतः वरुणं, मध्यतः बृहस्पतिं, उत्तरतः विष्णुम्
अयोजयन् ) उन [ देवताओं ] ने दक्षिण ओर वरुण को, बीच में बृहस्पति को और उत्तर
च्छन्ते ) विभिद्यन्ते । विनश्यन्ते ( अयातयामानि ) न यातो गतो याम उचितस-
मयो येषां तानि । समयानुकूलानि ( अभिचेरिरे ) अभिचारं कपटविचारं चक्रुः
( अरिष्टः ) अहिंसितः । सुरक्षितः ( प्रतनूम् ) विस्तृतम् ( हनिष्यामः ) नाश-
यिष्यामः ( स्तु ) अकारलोपः । अस्तु ( व्यश्नवामहै ) प्राप्नुयाम । समश्नयाम
( मद्धितीयाः ) अस्मद्—द्वितीय । प्रत्ययोत्तरपदयोश्च ( पा० ७ । २ । ९८ ) इति